शादी का रजिस्ट्रेशन नहीं तो क्या तलाक नहीं मिलेगा? जानें इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला दिया है कि हिंदू विवाह सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं हो सकता क्योंकि उसका रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपसी सहमति से तलाक के लिए फैमिली कोर्ट मैरिज सर्टिफिकेट की मांग को अनिवार्य नहीं बना सकती. यह फैसला उन जोड़ों के लिए बड़ी राहत है, जिनकी शादी पंजीकृत नहीं है और वे कानूनी रूप से अलग होना चाहते हैं.
क्या आपने अपनी शादी का रजिस्ट्रेशन नहीं कराया है? और क्या अब आपको तलाक लेने में मुश्किल आ रही है? अगर हाँ, तो इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला आपके लिए बहुत बड़ी राहत लेकर आया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सिर्फ इसलिए कि आपकी शादी रजिस्टर्ड नहीं है, आपकी शादी को अमान्य नहीं माना जा सकता और न ही इस वजह से तलाक की प्रक्रिया को रोका जा सकता है.
यह मामला आजमगढ़ के रहने वाले सुनील दुबे का है. सुनील और उनकी पत्नी मीनाक्षी ने 23 अक्टूबर, 2024 को आपसी सहमति से तलाक के लिए फैमिली कोर्ट में अर्जी दी. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन फैमिली कोर्ट ने एक पेंच फंसा दिया. कोर्ट ने 4 जुलाई, 2025 को आदेश दिया कि 29 जुलाई तक शादी का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट यानी मैरिज सर्टिफिकेट जमा किया जाए.
सुनील ने कोर्ट को बताया कि उनकी शादी 27 जून, 2010 को हुई थी और उस समय शादी का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य नहीं था. इसलिए, उनके पास मैरिज सर्टिफिकेट नहीं है. उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि उन्हें यह सर्टिफिकेट जमा करने से छूट दी जाए. हैरानी की बात यह है कि उनकी पत्नी मीनाक्षी भी इस बात से सहमत थीं. लेकिन फैमिली कोर्ट ने उनकी एक न सुनी और 31 जुलाई को उनकी अर्जी खारिज कर दी.
फिर मामला पहुंचा हाई कोर्ट
फैमिली कोर्ट के इस फैसले से परेशान होकर सुनील दुबे इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचे. हाई कोर्ट में जस्टिस मनीष कुमार निगम की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की.
हाई कोर्ट ने बहुत ही महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा:
- रजिस्ट्रेशन न होना शादी को अमान्य नहीं बनाता: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8(5) के अनुसार, अगर किसी हिंदू विवाह का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है, तो भी वह विवाह पूरी तरह से वैध है. रजिस्ट्रेशन सिर्फ शादी का एक सबूत है, शादी की वैधता का आधार नहीं.
- फैमिली कोर्ट का जोर देना गलत: हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट का मैरिज सर्टिफिकेट पर जोर देना पूरी तरह से अनुचित और गैर-जरूरी था. जब कानून खुद कहता है कि रजिस्ट्रेशन के बिना भी शादी वैध है, तो तलाक के लिए सर्टिफिकेट की अनिवार्यता थोपना गलत है.
- कानून का मकसद सुविधा देना है, अड़चन डालना नहीं: कोर्ट ने यह भी साफ किया कि शादी के रजिस्ट्रेशन का नियम बनाना राज्य सरकारों का काम है और इसका मुख्य उद्देश्य केवल शादी का प्रमाण पत्र देने की सुविधा प्रदान करना है, न कि लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी करना.
इस फैसले का आम लोगों के लिए क्या मतलब है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के दूरगामी और सकारात्मक परिणाम होंगे:
- प्रक्रिया होगी आसान: उन हजारों जोड़ों के लिए तलाक की प्रक्रिया आसान हो जाएगी, जिनकी शादी बहुत पहले हुई थी और उस समय रजिस्ट्रेशन का चलन या अनिवार्यता नहीं थी.
- अनावश्यक देरी से बचाव: अब फैमिली कोर्ट केवल मैरिज सर्टिफिकेट न होने के आधार पर तलाक के मामलों को लटका नहीं पाएंगी.
- कानून की सही समझ: यह फैसला इस बात पर जोर देता है कि कानूनी प्रक्रियाओं को असलियत और कानून की मूल भावना को ध्यान में रखकर चलाना चाहिए, न कि सिर्फ कागजी औपचारिकताओं पर अटक जाना चाहिए.
अंत में, हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 31 जुलाई, 2025 के आदेश को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि सुनील और मीनाक्षी की तलाक की अर्जी पर जल्द से जल्द फैसला लिया जाए, जो 2024 से लंबित है. यह फैसला न्याय की एक बड़ी जीत है जो यह सुनिश्चित करता है कि प्रक्रियात्मक बाधाएं लोगों के अधिकारों के रास्ते में न आएं.
(The above story first appeared on LatestLY on Aug 30, 2025 08:31 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

