भारत के प्रमुख शहरों में बेंगलुरु शहर महिला उद्यमियों को बेहतर अवसर देने में आगे है. अच्छी फंडिंग और मेंटरशिप के साथ ही महिलाओं को सही माहौल मिल रहा है. फिर भी कई मौकों पर झेलना पड़ता है जेंडर के कारण भेदभाव.भारत की सिलिकॉन वैली कहलाने वाला बेंगलुरु शहर महिला उद्यमियों के लिए देश के सबसे अनुकूल शहरों में से एक के रूप में उभरा है. यहां महिलाओं के शुरु किए स्टार्टअप की तादाद और उन्हें मिलने वाली फंडिंग में लगातार बढ़त दर्ज की जा रही है. इस मामले में बेंगलुरु ने दिल्ली-एनसीआर और मुंबई जैसे बड़े केंद्रों को भी पीछे छोड़ दिया है.
हाल ही में कर्नाटक डिजिटल अर्थव्यवस्था मिशन (केडीईएम), 3वन4 कैपिटल और स्टार्टअप कर्नाटक ने बेंगलुरु इनोवेशन रिपोर्ट (2025) जारी की. इसके मुताबिक साल 2010 से 2025 के बीच बेंगलुरु में लगभग 668 फीमेल-लेड स्टार्टअप सक्रिय रहे. इन स्टार्टअप्स ने कुल मिलाकर करीब 13.4 अरब डॉलर की फंडिंग जुटाई.
सऊदी अरब के कामयाब स्टार्टअप्स के पीछे है महिलाओं का योगदान
इसके मुकाबले, दिल्ली-एनसीआर में महिला नेतृत्व वाले 712 स्टार्टअप्स को लगभग 10 अरब डॉलर का निवेश मिला. जबकि मुंबई में ऐसे 465 स्टार्टअप्स हैं. जिन्होंने कुल 3.6 अरब डॉलर की फंडिंग हासिल की. अन्य महानगर जैसे हैदराबाद और चेन्नई इस रैंकिंग में बहुत पीछे हैं.
कई साल पहले अपना खुद का मीडिया स्टार्टअप 'योर स्टोरी' शुरु करने वाली फाउंडर और सीईओ श्रद्धा शर्मा का कहना है कि बेंगलुरु में लोग एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय साथ मिलकर आगे बढ़ने में विश्वास रखते हैं. यहां संस्थापक, कर्मचारी और निवेशक खुलकर अपने अनुभवों को साझा करते हैं.
बेंगलुरु महिला उद्यमियों के लिए बेहतर क्यों?
बेंगलुरु को भारत की सिलिकॉन वैली की तर्ज पर विकसित किया गया. यहां बड़ी टेक कंपनियों जैसे इंफोसिस और विप्रो के मुख्यालय हैं. ग्लोबल स्टार्टअप ईकोसिस्टम रिपोर्ट 2025 के अनुसार, बेंगलुरु को दुनिया के शीर्ष 14 स्टार्टअप शहरों में शामिल किया गया है. यहां 53 यूनिकॉर्न स्टार्टअप हैं जिनका कुल मूल्य 192 अरब डॉलर है.
लेकिन बेंगलुरु की सबसे बड़ी ताकत फंडिंग व्यवस्था है. यदि कोई उद्यमी निवेश की तलाश में है, तो बेंगलुरु सबसे उपयुक्त जगह है. ऐंबर एक नॉन-टॉक्सिक कुकवेयर ब्रांड है. इसकी सह संस्थापक हिमांशी टंडन बताती हैं कि बेंगलुरु में वेंचर कैपिटल फंड, एंजेल इंवेस्टर्स और सरकारी योजनाओं के जरिए स्टार्टअप्स को सहयोग मिलता है. इसके अलावा, को-वर्किंग स्पेस और टेक पार्क जैसी सुविधाएं भी हैं.
वह डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, "बेंगलुरु में अनुभवी संस्थापक और एंजेल निवेशकों से मिलना आसान है. यह इसके स्टार्टअप ईकोसिस्टम की खासियत है. नए उद्यमियों को मेंटरशिप लेने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं. यहां महिलाएं भी संस्थापक और निवेशक जैसी नेतृत्व वाली भूमिकाओं में सक्रिय रूप से दिखती हैं. जिससे महिला उद्यमियों के लिए सीखने के मौके और बढ़ जाते हैं. महिला निवेशक विशेष रूप से महिलाओं के व्यवसाय को आगे बढ़ाने में सहयोग भी करती हैं."
रुचि मित्तल हेन (एचईएन) इंडिया की संस्थापक हैं. यह मंच देशभर में महिला उद्यमियों को नेटवर्किंग, सहयोग, संसाधन और अवसर उपलब्ध कराने पर केंद्रित है. रुचि बताती हैं कि परिवार और सामाजिक ढांचे में अंतर की वजह से भी बेंगलुरु महिला उद्यमियों के लिए बेहतर शहर है. बेंगलुरु में देश के लगभग सभी राज्यों के लोग रहते हैं और यहां की जीवनशैली दिल्ली से काफी अलग है. बेंगलुरु में न्यूक्लियर फैमिली का चलन है.
रुचि कहती हैं, "यह फर्क लोगों के काम करने के तरीके, फैसले लेने की शैली, पैसे बचाने की आदत और निवेशकों के सामने अपने आइडिया पेश करने के तरीकों में दिखाई देता है. परिवार और सामाजिक दबाव कम होने के कारण महिलाएं अपने करियर और व्यवसाय के फैसले ज्यादा स्वतंत्रता और आत्मविश्वास के साथ ले पाती हैं."
दिल्ली और मुंबई पीछे क्यों?
दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु के स्टार्टअप माहौल में अंतर का कारण केवल फंडिंग ही नहीं, बल्कि शहर का कल्चर भी है. दिल्ली में आधारित यूक्लीन, एक लॉन्ड्री और ड्राई‑क्लीनिंग स्टार्टअप है. सह‑संस्थापक और मार्केटिंग हेड गुंजन तनेजा ने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया कि दिल्ली का स्टार्टअप इकोसिस्टम पुरुष प्रधान है. यहां निवेशक अक्सर उन व्यवसायों में निवेश करते हैं जिनसे वे पहले से परिचित हों.
गुंजन कहती हैं, "ऐसा मान लिया जाता है कि व्यवसाय में पुरुष ही जोखिम उठा सकते हैं. महिला उद्यमी धीमे काम करती हैं. वे तेज गति से व्यवसाय नहीं बढ़ा सकतीं. जब तक महिलाओं को सिर्फ छोटे शुरुआती निवेश (सीड कैपिटल) नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर काम करने के लिए जरूरी पैसा (स्केल कैपिटल) नहीं दिया जाता, तब तक यह अंतर बना रहेगा. इसके विपरीत, बेंगलुरु में निवेशक महिलाओं के इरादों और सीखने की क्षमता पर भरोसा करके निवेश करते हैं."
बेंगलुरु में तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी ज्यादा
स्मार्टफिन कैपिटल के सह संस्थापक अमित बताते हैं कि दिल्ली में आईआईटी और आईआईआईटी को छोड़ दें, तो कोई प्रतिष्ठित तकनीकी कॉलेज नहीं है. जिसकी वजह से दिल्ली पीछे रह जाता है. स्मार्टफिन कैपिटल स्टार्टअप्स को फंड जुटाने में मदद करता है.
अमित डीडब्ल्यू से कहते हैं, "दक्षिण भारत के राज्यों जैसे चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलुरु में बहुत सारे इंजीनियरिंग कॉलेज हैं. इसी वजह से बेंगलुरु में टेक टैलेंट का पूल कहीं ज्यादा मजबूत है. इसमें महिला और पुरुष दोनों शामिल हैं. दिल्ली और मुंबई में किसी टेक प्रोफेशनल को रखने के लिए जहां सालाना डेढ़ से दो करोड़ रुपये तक देने पड़ सकते हैं. वहीं उसी स्तर का टैलेंट बेंगलुरु में 80 लाख रूपए की सैलरी में मिल जाता है. इसके अलावा, दक्षिण भारत के राज्यों की अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी बेहतर है.”
कर्नाटक सरकार ने भी महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए विशेष फंड और योजनाएं शुरू की हैं. साल 2010 के बाद से महिला संस्थापकों का समुदाय धीरे-धीरे मजबूत हुआ है. निजी कंपनियों ने भी महिला-केंद्रित फंड्स पर ध्यान दिया. इस लिहाज से दिल्ली का स्टार्टअप इकोसिस्टम बेंगलुरु से लगभग दस साल पीछे है. जबकि मुंबई करीब पांच साल पीछे माना जाता है.
अमित बताते हैं, "बदलाव धीमा है, पर आ रहा है. मेरे अनुभव में महिला नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स की सफलता दर पुरुष नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स से अधिक रही है. कई मामलों में पुरुष संस्थापक जल्दी हार मान लेते हैं या बीच में ही स्टार्टअप छोड़ देते हैं. जबकि महिलाएं अधिक धैर्य और निरंतरता के साथ काम करती हैं."
समावेशी होने के बावजूद महिलाओं को क्या रोक रहा है?
आंकड़े बताते हैं कि स्टार्टअप इकोसिस्टम में समावेशिता है. लेकिन महिलाओं के अनुभव कुछ और बता रहे हैं. अक्सर स्टार्टअप मीट्स, कॉन्फ्रेंस और नए फंड लॉन्च के दौरान महिलाएं नहीं दिखाई देती.
इनोचि हेल्थकेयर की सह संस्थापक शिवानी गुप्ता कहती हैं कि निवेशक चाहे खुलकर कह दें कि वे महिला नेतृत्व वाले स्टार्टअप्स को फंड करने के लिए तैयार हैं, फिर भी उन पर भरोसा कम होता है. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "यह भेदभाव हर स्तर पर महसूस होता है. चाहे वह फंडिंग, डिस्ट्रीब्यूशन, सप्लाई, प्रोक्योरमेंट, फोरम में प्रतिनिधित्व या बोर्ड में शामिल होना हो. जब मैं फंडिंग मांगने के लिए जाती हूं, तो अक्सर मुझसे पूछा जाता है कि कंपनी का निर्णय लेने वाला कौन है? क्या वे मालिक से बात कर सकते हैं."
छठी आर्थिक जनगणना के अनुसार, भारत में कुल उद्यमियों में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 13.76 प्रतिशत है. यानी देश में ज्यादातर व्यवसाय या स्टार्टअप अब भी पुरुषों द्वारा ही चलाए जा रहे हैं. इसके मुकाबले, वैश्विक स्तर पर औसतन लगभग 30 से 35 प्रतिशत स्टार्टअप महिलाओं के स्वामित्व या नेतृत्व में होते हैं.
भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अनुसार, भारत में अब दो लाख से ज्यादा सरकारी मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स हैं. साल 2025 में 44,000 नए स्टार्टअप्स को मान्यता दी गई. इनमें से लगभग 48 प्रतिशत स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक या संस्थापक है.
हेन इंडिया की रुचि मित्तल का माना है कि इस तरह के आंकड़े जो भारत के स्टार्टअप ईकोसिस्टम में महिलाओं की हिस्सेदारी को दर्शाते हैं, उन्हें विश्वसनीय नहीं माना जा सकता. रूचि कहती हैं, "सबसे पहले, महिलाओं को व्यवसाय करने के लिए परिवार का पूरा समर्थन नहीं मिलता. उनसे अक्सर कहा जाता है कि वे घर और परिवार संभालें. जबकि पुरुषों से कमाने की उम्मीद की जाती है. यह सोच आज भी लोगों के दिमाग में गहराई से बैठी हुई है. इसी वजह से मुझे ऐसे कई सर्वेक्षणों पर भरोसा नहीं होता.”
वह आगे बताती हैं कि पूरी तरह महिलाओं द्वारा चलाए जाने वाले स्टार्टअप्स की संख्या बहुत कम है. ज्यादातर मामलों में नेतृत्व की भूमिका में कोई न कोई पुरुष भी होता है और कई बार निवेशक उसी पुरुष पार्टनर पर भरोसा करके निवेश करते हैं. वह ऐसी कई महिलाओं को जानती हैं जिन्हें मीटिंग के दौरान कमरे से बाहर जाने को कहा गया. यह साफ दिखाता है कि स्टार्टअप और निवेश की दुनिया में लैंगिक भेदभाव आज भी गहराई से मौजूद है.










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