देश की खबरें | यह गलत मान लिया गया कि राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के एक किलोमीटर के दायरे रिजॉर्ट कानूनी हैं: एनजीटी

नयी दिल्ली, 26 फरवरी राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कहा है कि एक रिपोर्ट में यह गलत तरीके से मान लिया गया कि उत्तराखंड में राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के एक किलोमीटर के दायरे में रिसॉर्ट कानूनी हैं। एनजीटी ने उपचारात्मक कार्रवाई के लिए ‘‘उच्च-स्तरीय अधिकारियों" की एक समिति बनायी है।

एनजीटी राजाजी राष्ट्रीय उद्यान की चिल्ला रेंज में होटल, रिसॉर्ट, पब, क्लब और आश्रम के अवैध संचालन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के संबंध में मामले की सुनवाई कर रहा था।

एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए के गोयल वाली एक पीठ ने कहा कि पिछले साल अक्टूबर में अधिकरण ने पर्यावरण की बहाली के लिए क्षतिपूर्ति की वसूली के साथ ही 19 रिसॉर्ट द्वारा उल्लंघन के खिलाफ उपचारात्मक कार्रवाई का निर्देश दिया था, जिसके बाद राजाजी राष्ट्रीय उद्यान निदेशक और उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूकेपीसीबी) द्वारा इस महीने की शुरुआत में रिपोर्ट दायर की गई।

पीठ में न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद भी शामिल थे। पीठ ने कहा कि रिपोर्ट के अनुसार, अवैध रूप से संचालित रिसॉर्ट के खिलाफ कार्रवाई की गई, लेकिन छह रिसॉर्ट बाघ अभयारण्य की सीमा के बाहर थे। पीठ ने कहा कि इनमें वन तरंग, महादेव पानी रिज़ॉर्ट, आश्रम महादेव पानी रिज़ॉर्ट, फ़ॉरेस्ट रिज़ॉर्ट/विंध्यवासी कॉटेज, माई का आश्रम, नेचर रिज़ॉर्ट बुकंडी (हीराखाल) और सुलीन जंगल लॉज, बुकंडी (हीराखाल) शामिल हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘हमारा विचार है कि रिपोर्ट में इस मुद्दे को पूरी तरह से शामिल नहीं किया गया है और कानून के अधिदेश की अनदेखी की गई है और यह (कि) निर्माण न केवल जंगल के भीतर बल्कि बाघ अभयारण्य की सीमा के एक किलोमीटर के बाहर भी निषिद्ध या विनियमित है, जो कि है पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र (अधिसूचना) के तहत भी आता है।’’

पीठ ने कहा, ‘‘इस प्रकार यह मानना गलत है कि बाघ अभयारण्य की सीमा के बाहर के रिसॉर्ट कानूनी हैं, भले ही वे बाघ अभयारण्य की सीमा के एक किलोमीटर के भीतर हों।’’

इसने कहा कि इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं है कि छह रिसॉर्ट को पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ईएसजेड) अधिसूचना और सीमांकन का उल्लंघन करने के लिए जिम्मेदार कैसे नहीं ठहराया गया।

पीठ ने कहा कि जिस हद तक गतिविधियों को वैध ठहराया गया है, इस मामले पर फिर से विचार करने की जरूरत है। पीठ ने कहा कि पहले गठित समिति के स्थान पर, ‘‘उच्च स्तर के अधिकारियों’’ की एक समिति का गठन किया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा, ‘‘समिति में अब एससीएस पर्यावरण, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) वन्यजीव, भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के निदेशक, एकीकृत क्षेत्रीय कार्यालय, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, देहरादून और निदेशक, बाघ अभयारण्य, शामिल होंगे।’’

इसने कहा कि समिति की एक बैठक दो सप्ताह के भीतर होनी चाहिए, जबकि आगे की उपचारात्मक कार्रवाई तीन महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए।

पीठ ने कहा कि 31 मई तक की अनुपालन स्थिति की एक कार्रवाई रिपोर्ट 30 जून तक दाखिल की जाए।

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