देश की खबरें | महिला संविदा कर्मी भी बाल देखभाल अवकाश की अधिकारी : उत्तराखंड उच्च न्यायालय
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नैनीताल, 25 जुलाई उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने महिला संविदा कर्मियों को बड़ी राहत देते हुए आदेश दिया कि हर साल उन्हें भी 31 दिनों का बाल देखभाल अवकाश दिया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति आलोक वर्मा की तीन सदस्यीय पीठ ने यह फैसला शुक्रवार को गढ़वाल क्षेत्र में पदस्थ आयुर्वेदिक चिकित्सक तनुजा तोल्लिया की याचिका पर सुनवाई करने के बाद सुनाया।
अदालत ने कहा कि नियमित कर्मचारियों की तरह संविदा पर नियुक्त महिला कर्मी मातृत्व अवकाश के लिए अर्हता रखती हैं।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दो साल के बजाय संविदा पर कार्यरत महिला को प्रसूति के लिए एक साल में तब तक 31 दिन का बाल देखभाल अवकाश दिया जाएगा जब तक उसके पहले दो बच्चे 18 साल के नहीं हो जाते।
इससे पहले तोल्लिया ने वर्ष 2018 में बेटे के जन्म के बाद मातृत्व अवकाश नहीं दिये जाने पर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।
उन्होंने अपनी याचिका में उच्च न्यायालय के एक आदेश का हवाला दिया जिसमें मातृत्व अवकाश देने की बात कही गई थी। याचिकार्ता ने कहा कि सरकार द्वारा 2011 में जारी आदेश के मुताबिक महिला कर्मी जब तक उसके दो बच्चे 18 साल के नहीं हो जाते तब तक दो साल या 730 दिन के बाल देखभाल अवकाश की अधिकारी है।
सरकार ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि संविदा पर काम कर रही महिला कर्मी मातृत्व अवकाश के लिए हकदार नहीं हैं क्योंकि उनकी नियुक्ति एक बार में एक साल के लिए होती है।
सरकार ने संविदा की शर्तो को रेखांकित किया जिसमें नियुक्ति पत्र में स्पष्ट किया गया है कि संविदा कर्मी एक साल में 14 दिन की छुट्टी के अधिकारी हैं।
इसके साथ ही सरकार ने तर्क दिया कि संविदा कर्मियों के दफ्तर नहीं आने पर उन्हें उस दिन का भुगतान नहीं किया जाता है। साथ ही कहा कि संविदा कर्मियों को सरकारी सेवा का हिस्सा नहीं माना जाता।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने 14 जुलाई को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
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