महिलाओं के विरोध से तालिबान को किस बात का डर?
अफगानिस्तान में महिलाओं पर थोपी जा रही पाबंदियां बद से बदतर होती जा रही हैं.
अफगानिस्तान में महिलाओं पर थोपी जा रही पाबंदियां बद से बदतर होती जा रही हैं. तालिबान की सेंसरशिप से बचकर जो खबरें दुनिया के सामने आ रही हैं, वह बेहद चिंताजनक हैं.संयुक्त राष्ट्र के अफगानिस्तान सहायता मिशन (यूएनएएमए) ने साझा किया है कि जून की शुरुआत में अफगानिस्तान के हेरात शहर में तालिबान ने ड्रेस कोड का पालन न करने के आरोप में लगभग 30 महिलाओं को हिरासत में ले लिया.
महिलाओं की गिरफ्तारी के बाद हेरात के इंजिल में लोग आक्रोशित होकर सड़कों पर उतर आए. शिया बहुल इस इलाके में बड़ी संख्या में लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए. यह समुदाय पहले से ही तालिबान के कट्टर सुन्नी शासन के चलते असुरक्षा, भेदभाव और दबाव का सामना कर रहा है.
संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, तालिबान प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं. इस हिंसा में एक बच्चे समेत कम से कम दो अन्य लोगों की मौत हो गई और 20 से भी ज्यादा लोग घायल हुए.
हालांकि, तालिबान ने महिलाओं की गिरफ्तारी से जुड़ी खबरों को खारिज कर दिया है. लेकिन इस घटना ने महिला अधिकार कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी पैदा कर दी है. साथ ही, महिलाओं की स्वतंत्रता और देश में सार्वजनिक जगहों पर तालिबान के बढ़ते नियंत्रण को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं.
क्यों हैं हेरात में तालिबान के खिलाफ गुस्से की लहर
अफगान महिला आंदोलन के नेटवर्क की दो सदस्यों ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि हेरात में महिलाओं की गिरफ्तारियां तालिबान के दमन का नमूना है. एक सदस्य ने डीडब्ल्यू से कहा, "हेरात में गिरफ्तार की गई हर महिला उन लाखों अफगान महिलाओं के दर्द की आवाज है, जो लैंगिक भेदभाव और पाबंदियों के बीच जीने को मजबूर हैं.” उन्होंने आगे कहा, "आजादी महिलाओं का अधिकार है. तालिबान का दमन मंजूर नहीं.”
एक अन्य सदस्य ने कहा कि तालिबान महिलाओं की मामूली पसंद को भी अपराध करार दे रहा है. उन्होंने कहा, "सिर्फ अपने कपड़े चुनने के लिए तालिबान महिलाओं को गिरफ्तार कर रहा है. यह ना इंसानियत है और ना धर्म. यह महिलाओं पर अत्याचार है, लेकिन साथ ही यह इंसानियत के खिलाफ भी है.”
साफ है कि हेरात में हुआ विरोध सिर्फ गिरफ्तार महिलाओं के लिए उठी आवाज नहीं थी, बल्कि तमाम खतरों के बावजूद अफगान समाज में तालिबान की सत्ता के खिलाफ उठ रहे विरोध का भी संकेत है.
पूर्व अफगान राजनयिक और महिला अधिकार कार्यकर्ता निगरा मिरदाद ने कहा, "ये विरोध अफगान लोगों और महिलाओं के संघर्ष की तस्वीर सामने लाता है. साथ ही, यह भी दिखाता है कि कई अफगान पुरुष भी देश की महिलाओं के साथ खड़े हैं.” यह एकता तालिबान के पिछले पांच सालों में खड़े किए गए दमन के साम्राज्य के लिए चुनौती जैसी है.
तालिबान शासन के पांच साल
हेरात में हुआ विरोध भले ही एक स्थानीय घटना हो, लेकिन यह जिस समय हुआ है, वह इसे एक खास राजनीतिक महत्व देता है. अगस्त में तालिबान के दोबारा सत्ता संभाले पांच साल पूरे होंगे. गौर करने वाली बात यह है कि तालिबान का पहला शासन भी लगभग पांच साल ही चला था यानी 1996 से 2001 तक. इसके बाद 11 सितंबर के आतंकी हमलों के जवाब में अमेरिका के हमले के बाद उसका शासन समाप्त हो गया था.
आज बहुत कम लोग उम्मीद करते हैं कि तालिबान का शासन फिर से उसी तरह ढह सकता है. अब तालिबान सरकारी संस्थाओं, सुरक्षा तंत्रों और देश के ज्यादातर सार्वजनिक जीवन को पूरी तरह नियंत्रित कर रहा है. राजनीतिक विरोध को दबा दिया गया है और स्वतंत्र मीडिया पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं.
हालांकि, सत्ता में वापसी के पांच साल पूरे होना एक ऐतिहासिक महत्व रखता है. यह अफगान लोगों को याद दिलाता है कि तालिबान का शासन पहले भी एक बार खत्म हो चुका है. जबकि उस समय भी तालिबानी शासन के ढहने की उम्मीद नजर नहीं आ रही थी.
तालिबान क्यों मजबूत कर रहा अपना नियंत्रण
अफगान उलेमा रिसर्च काउंसिल के उप प्रमुख और धार्मिक विद्वान मोहम्मद उस्मान तारिक का कहना है कि तालिबान के हालिया कदम उसके शासन के अंदर बढ़ रही चिंता का संकेत हैं.
तालिबान महिलाओं पर लगाई पाबंदियों को धार्मिक मुद्दा करार देता है, लेकिन मोहम्मद उस्मान तारिक का मानना है कि इसके पीछे की असली वजह सत्ता को बचाए रखना है.
तारिक ने डीडब्ल्यू से कहा, "तालिबान सरकार के नियंत्रण बढ़ाने की एक वजह यह भी है कि वह किसी को भी यहां तक कि महिलाओं को भी विरोध करने की अनुमति नहीं देना चाहते हैं. यहां तक कि स्मार्टफोन पर रोक लगाने की कोशिश भी इसी डर का सबूत है. उन्हें लगता है कि ये चीजें उनके शासन और अस्तित्व के लिए खतरा बन सकती हैं, इसलिए वह इन पर सख्ती से रोक लगा रहे हैं.”
उन्होंने कहा कि तालिबान शासन के शुरुआती बरसों के मुकाबले अब अफगानिस्तान में लोगों की सोच बदल चुकी है. तारिक के मुताबिक, कुछ लोग जो शुरुआत में तालिबान का समर्थन करते थे या मानते थे कि 20 साल के संघर्ष के बाद तालिबान बदल गया है, अब वे निराश हो चुके हैं.
तारिक ने डीडब्ल्यू से कहा, "यह स्वाभाविक है कि तालिबान अपने शासन को लेकर चिंतित है. वे समझते हैं कि आखिरकार यह दमन का शासन है और एक दिन इसका अंत होना ही है. यहां तक कि तालिबान के अपने कुछ सदस्य भी मानते हैं कि यह लंबे समय तक नहीं चल सकता है.”
स्मार्टफोन पर लगे बैन से अफगानिस्तान में डर
हेरात में हिंसा के साथ ही तालिबान ने एक और कड़ा कदम उठाया है. तालिबान अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों को स्मार्टफोन का इस्तेमाल बंद करने का आदेश दिया गया है. ऑनलाइन सामने आए कुछ वीडियो में कथित तौर पर तालिबान सदस्यों को आदेश का पालन करते हुए अपने फोन नष्ट करते हुए देखा गया.
अब कई अफगान लोगों को डर है कि ये पाबंदियां धीरे-धीरे पूरे देश की आम जनता पर भी लागू की जा सकती हैं.
एक ऐसा देश जहां स्वतंत्र पत्रकारिता पहले ही कमजोर हो चुकी है और कई पत्रकार दबाव और डर का सामना कर रहे हैं, वहां स्मार्टफोन लोगों के लिए सच सामने लाने का एक अहम और एकलौता जरिया बन चुका है. इसके जरिए ही लोग हिंसा और पाबंदियों के वीडियो रिकॉर्ड कर बाहर की दुनिया तक पहुंचा रहे हैं.
ऐसे में स्मार्टफोन पर बैन सिर्फ तकनीकी प्रतिबंध नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि तालिबान सिर्फ लोगों के कामों पर नहीं, बल्कि उस जानकारी पर भी नियंत्रण चाहता है, जो दुनिया तक पहुंच रही है.
तालिबान के लिए औरतों को निशाना बनाना आसान
अफगानिस्तान की पूर्व सांसद, राजनयिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता शिंकई करोखैल का कहना है कि तालिबान का दमन सिर्फ महिलाओं को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसके शासन की कमजोरियों से भी जुड़ा है.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "दुर्भाग्य से तालिबान शासन लोगों की जरूरतें पूरी करने, सार्वजनिक सेवाएं देने और रोजगार के अवसर पैदा करने में विफल रहा है. इसलिए अब उन्हें डर है कि जनता उनके खिलाफ उठ खड़ी हो सकती है.”
उन्होंने आगे कहा, "तालिबान के नजरिए में लोगों को अलग-अलग तरीकों से डराना और दबाना जरूरी है, ताकि वे अपनी आवाज न उठा सकें. उनके लिए महिलाएं सबसे आसान निशाना हैं, जिन पर ताकत का इस्तेमाल करके उन्हें चुप कराया जा सकता है.”
हेरात में हुआ विरोध एक अकेली घटना नहीं है. तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद से महिलाओं की आजादी पर लगातार पाबंदियां लगाई गई हैं. लड़कियों की आगे की पढ़ाई रोकना, महिलाओं को विश्वविद्यालयों से बाहर करना, नौकरियों पर प्रतिबंध लगाना और सार्वजनिक जीवन में उनकी मौजूदगी सीमित करना तालिबान की नीति का हिस्सा रहा है.
तालिबान धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर इन फैसलों को सही बताता है, लेकिन महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये नीतियां महिलाओं को समाज से अलग करने और डर के जरिए नियंत्रण बनाए रखने का माध्यम हैं.
शासन को सहने और स्वीकार करने में अंतर
2021 में सत्ता संभालने के तुरंत बाद तालिबान जिस तरह के अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा था, वह अब काफी कम हो गया है. पाकिस्तान के साथ तनाव को छोड़ दें तो आज तालिबान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव काफी कम है. रूस ने तालिबान सरकार को आधिकारिक तौर पर अफगानिस्तान की नई सरकार के रूप में मान्यता दे दी है. वहीं, कई अन्य देश औपचारिक मान्यता देने से इनकार करते हुए भी तालिबान के साथ सीमित सहयोग बनाए हुए हैं.
पूर्व अफगान राजनयिक निगरा मिरदाद का कहना है कि दुनिया का ध्यान अब दूसरे मुद्दों की ओर बंट गया है.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "पिछले पांच वर्षों में उन्होंने जिस तरह की नीतियां लागू की है, उसके साथ उनका सत्ता में बने रहना संभव नहीं है.” हालांकि, उन्होंने यह भी जाहिर किया कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात ने तालिबान को इतने समय तक सत्ता में बने रहने में मदद दी है.
इस हालत ने अफगान लोगों को मुश्किल दौर में डाल दिया है. देश के अंदर तालिबान के खिलाफ गुस्सा जाहिर करना जोखिम भरा है, जबकि देश के बाहर दुनिया का ध्यान अब सुरक्षा, प्रवासन और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर बंट चुका है.
हेरात की घटना एक बात साफ दिखाती है कि बेशक तालिबान के पास ताकत और नियंत्रण है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि लोगों ने उसे स्वीकार कर लिया है.
(The above story first appeared on LatestLY on Jun 25, 2026 02:10 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

