3 सितंबर की बड़ी खबरें
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रूस में जर्मन सांस्कृतिक संस्थान 'गोएथे-इंस्टीट्यूट' होंगे बंद
रूस में जर्मन सांस्कृतिक संस्थान 'गोएथे-इंस्टीट्यूट' होंगे बंद
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने गुरुवार, 3 सितंबर को घोषणा की कि देश में जर्मनी के सांस्कृतिक केंद्र 'गोएथे-इंस्टीट्यूट' को बंद कर दिया जाएगा. लावरोव ने कहा कि मॉस्को, सेंट पीटर्सबर्ग और येकातेरिनबर्ग शहरों में मौजूद ये केंद्र बंद किए जाएंगे. यह रूस का जर्मनी के खिलाफ जवाबी कदम है. जर्मनी ने लाइपजिग-हाले हवाई अड्डे पर ड्रोन हमले के प्रयास के लिए रूस को जिम्मेदार ठहराया. इसके बाद, जर्मनी ने बर्लिन स्थित 'रशियन हाउस' सांस्कृतिक केंद्र और बॉन स्थित रूसी वाणिज्य दूतावास को बंद करने का निर्णय लिया था.
व्लादिवोस्तोक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम को संबोधित करते हुए लावरोव ने कहा, "हमारे सांस्कृतिक केंद्र को बर्लिन से निकाले जाने के बाद स्वाभाविक रूप से इन्हें भी बंद कर दिया जाएगा." उन्होंने कहा, "उन्होंने [जर्मनी] जानबूझकर यह कदम उठाया, जिसका अर्थ रूस में उनकी सांस्कृतिक मौजूदगी का अंत है." लावरोव ने यह भी जोड़ा कि पश्चिमी देशों के साथ तनाव के बावजूद ये केंद्र अब तक खुले हुए थे. रूस ने आगे सेंट पीटर्सबर्ग में जर्मनी के महावाणिज्य दूतावास को बंद करने जैसे अन्य कदम उठाने की भी चेतावनी दी है.
इससे पहले 2 सितंबर को रूस के विदेश मंत्रालय ने जर्मनी के दूतावास प्रभारी को तलब किया था. मंत्रालय ने जर्मन नेतृत्व के रूस-विरोधी बयानों और कदमों पर अपना विरोध दर्ज कराया. वहीं मंगलवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जर्मनी पर रूस को फंसाने के लिए फर्जी सबूत गढ़ने का आरोप लगाया था. गोएथे-इंस्टीट्यूट 1992 में रूस में शुरू हुआ था और यह वहां सक्रिय अंतिम जर्मन संस्थानों में से एक था.
जलवायु न्याय की मांग कर रहा है आपदा प्रभावित नेपाल
नेपाल में पिछले हफ्ते आई विनाशकारी बाढ़ के चलते 1,200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 4,000 से अधिक लोग लापता हैं. नेपाल के लोग इस आपदा से दुखी होने के साथ-साथ नाराज भी हैं. नेपाल के एक जलवायु कार्यकर्ता और राजनेता ताशी ल्हाजोम ने न्यूज एजेंसी एएफपी से कहा कि नेपाल ने ऐसा क्या किया है, जिसकी वजह से ऐसा हुआ. उन्होंने कहा, "नेपाल जलवायु के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में से एक है लेकिन साथ ही ये सबसे क्लाइमेट-फ्रेंडली देश भी है."
26 अगस्त को एक ग्लेशियर के टूटने की वजह से चीन-नेपाल सीमा पर बाढ़ आई थी. ग्लेशियर के टूटने की स्पष्ट वजह अभी पता नहीं चली है लेकिन जलवायु परिवर्तन के चलते दुनियाभर में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और ऐसी आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है. तीन करोड़ लोगों की आबादी वाले नेपाल का ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में योगदान बेहद कम है लेकिन उसे आपदाओं के रूप में इसका नुकसान झेलना पड़ता है. ल्हाजोम कहते हैं, "हम एक ऐसे अपराध की सजा भुगत रहे हैं, जो हमने किया ही नहीं है."
नेपाल के ग्लेशियर वैज्ञानिक तेनजिंग चोग्याल ने कहा कि वैश्विक उत्सर्जन को बढ़ाने वाले अमीर औद्योगिक देशों को अपनी भूमिका स्वीकार करनी चाहिए और इसकी कुछ जिम्मेदारी लेनी चाहिए. काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) के आपदा विशेषज्ञ शाश्वत सान्याल ने कहा कि यह क्षेत्र दुनिया की किसी और जगह की की तुलना में लगभग "दोगुनी दर" से गर्म हो रहा है.
नेपाल के नेताओं का कहना है कि तेजी से बदलते पर्वतीय वातावरण के हिसाब से खुद को ढालने के लिए नेपाल को दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय मदद की जरूरत है. नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने कहा है कि नेपाल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह मुद्दा मजबूती से उठाना चाहिए कि उसके द्वारा झेली गईं आपदाएं जलवायु परिवर्तन का नतीजा हैं. नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने इसे एक चेतावनी संकेत बताया है और इसे "जलवायु न्याय" की मांग उठाई है.
(The above story first appeared on LatestLY on Sep 03, 2026 12:10 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

