देश की खबरें | उत्तराखंड बाढ़: विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र में अधिक मानवीय हस्तक्षेत्र की ओर इशारा किया
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. पर्यावरण विशेषज्ञों ने रविवार को कहा कि पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में मानवीय हस्तक्षेप बढ़ने से यह जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया है। उत्तराखंड के चमोली जिले में जोशीमठ में एक ग्लेशियर टूटने से राज्य में भीषण बाढ़ आ गई।
नयी दिल्ली, सात फरवरी पर्यावरण विशेषज्ञों ने रविवार को कहा कि पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में मानवीय हस्तक्षेप बढ़ने से यह जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया है। उत्तराखंड के चमोली जिले में जोशीमठ में एक ग्लेशियर टूटने से राज्य में भीषण बाढ़ आ गई।
ग्लेशियर के टूटने से धौली गंगा नदी में भीषण बाढ़ आई और हिमालय के ऊपरी इलाकों में बड़े पैमाने पर तबाही हुई।
तपोवन-रेनी में एक विद्युत परियोजना में काम करने वाले 150 से अधिक मजदूरों की मौत होने की आशंका है। यह जानकारी भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के प्रवक्ता ने परियोजना प्रभारी के हवाले से दी। अभी तक तीन शव बरामद किए गए हैं।
ग्रीनपीस इंडिया के वरिष्ठ जलवायु एवं ऊर्जा प्रचारक अविनाश चंचल ने कहा, ‘‘यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। हमारी संवेदना लापता निर्माण श्रमिकों और उत्तराखंड के प्रभावित लोगों के साथ हैं। हालांकि इस घटना के सटीक कारण का अभी तक पता नहीं चल पाया है और इसकी ईमानदार जांच की आवश्यकता है, लेकिन यह स्पष्ट है कि पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में मानव हस्तक्षेप बढ़ रहा है जो इसे जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील बना रहा है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में भारी निर्माण कार्य से बचा जाना चाहिए।’’
एक अन्य विशेषज्ञ एवं जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल की महासागरों और क्रायोस्फीयर पर एक विशेष रिपोर्ट के प्रमुख लेखकों में से एक अंजल प्रकाश ने कहा कि तबाही के कारण की व्याख्या करना अभी बहुत जल्दबाजी होगी। उन्होंने कहा कि प्रथमदृष्टया ऐसा प्रतीत होता है ऐसा जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण हुआ है जिससे अब ‘‘एक खतरनाक और अपरिवर्तनीय स्थिति’’ बन गई है।
उन्होंने यह भी कहा कि हिमालयी क्षेत्र सबसे कम निगरानी वाला क्षेत्र है और सरकार को इन क्षेत्रों पर नज़र रखने में अधिक संसाधन खर्च करने की आवश्यकता है ताकि अधिक जागरूकता हो।
उन्होंने कहा, ‘‘हिमालयी क्षेत्र सबसे कम निगरानी वाला क्षेत्र है और यह घटना वास्तव में दिखाती है कि हम कितने जोखिम में हो सकते हैं। मैं सरकार से इस क्षेत्र की निगरानी में अधिक संसाधन खर्च करने का अनुरोध करूंगा ताकि हमें परिवर्तन प्रक्रिया के बारे में अधिक जानकारी हो। इसका नतीजा यह होगा कि हम अधिक जागरूक होंगे और बेहतर अनुकूलन प्रथाओं को विकसित कर सकते हैं।’’
प्रकाश इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी), हैदराबाद में एक अनुसंधान निदेशक और एडजंक्ट एसोसिएट प्रोफेसर भी हैं।
आईआईटी इंदौर में सहायक प्रोफेसर, (ग्लेशियोलॉजी एंड हाइड्रोलॉजी) मोहम्मद फारूक आजम ने ग्लेशियर टूटने को एक दुर्लभ घटना करार देते हुए कहा कि उपग्रह और गूगल अर्थ की तस्वीरों में इस क्षेत्र के पास कोई हिमनद झील नहीं दिखती, लेकिन एक जलक्षेत्र होने की संभावना है।
उन्होंने कहा, ‘‘जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित मौसम के स्वरूप जैसे बर्फबारी और बारिश में वृद्धि हुई है, और बहुत अधिक सर्दियां नहीं पड़ने से बहुत अधिक बर्फ पिघलने लगी है।’’
ग्रीनपीस इंडिया के चंचल ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र के लिए वर्तमान विकास मॉडल के बारे में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
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