नयी दिल्ली, 20 अप्रैल कर विशेषज्ञों का मानना है कि उच्चतम न्यायालय के कंपनियों की संबद्ध इकाइयों के बीच ‘ट्रांसफर प्राइसिंग’ पर फैसले से उच्च न्यायालयों में इस तरह के मामले बढ़ेंगे। इससे आयकर विभाग भी न्यायाधिकरण के प्रतिकूल आदेश के खिलाफ अदालत में अपील कर सकता है।
शीर्ष अदालत के फैसले के अनुसार, उच्च न्यायालय इस बात की जांच कर सकता है कि कंपनी की संबद्ध इकाइयों के बीच वाणिज्यिक लेन-देन मामले में आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) ने उपयुक्त नियमों का पालन किया है या नहीं।
उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में सॉफ्टब्रांड्स / एसएपी लैब्स की अगुवाई में ट्रांसफर प्राइसिंग मामलों में ‘तुलनात्मक चयन’ के मुद्दे को लेकर दायर याचिकाओं पर कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्णय को खारिज कर दिया।
‘ट्रांसफर प्राइसिंग’ से मतलब एक कंपनी (मूल कंपनी) के अंतर्गत आने वाली इकाइयों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य निर्धारण से है। इसके आधार पर विदेशी कंपनी की भारतीय अनुषंगी पर कर देनदारी का निर्धारण होता है। प्राय: विदेशी कंपनियों और भारतीय कर प्राधिकरण के बीच इस तरह के मामलों में कर निर्धारण को लेकर विवाद उत्पन्न होता है।
उच्च न्यायालय ने पूर्व में कहा था कि ‘ट्रांसफर प्राइसिंग’ मामले में सौदा बाजार मूल्य पर हुआ है या नहीं, आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण का निर्धारण अंतिम होगा और उच्च न्यायालय कानून की धारा 260 ए के तहत उसकी जांच नहीं कर सकता, क्योंकि इसमें कानून का कोई बड़ा सवाल नहीं उठता।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस फैसले को खारिज कर दिया। उसने कहा कि कानून में ऐसा नहीं कि सभी मामलों में एक ही तरह से विधान लागू हो, अत: न्यायाधिकरण का ‘ट्रांसफर प्राइसिंग’ में निर्णय अंतिम नहीं हो सकता।
इंडस लॉ में भागीदार श्रुति केपी ने कहा कि शीर्ष अदालत ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया है और यह माना है कि न्यायाधिकरण की तरफ से स्वतंत्र रूप से बाजार आधारित मूल्य निर्धारण को अंतिम नहीं माना जा सकता है और ‘तुलनात्मक रूप से चयन’ को लेकर भी मामले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
श्रुति ने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय के फैसले से उच्च न्यायालयों में संबंधित कानूनी मामलों की संख्या बढ़ेगी। इसका कारण करदाता और विभाग दोनों अपीलीय न्यायाधिकरण के प्रतिकूल निर्णय को लेकर उच्च न्यायालय में अपील करना पसंद कर सकते हैं।’’
प्राइस वॉटरहाउस एंड कंपनी में भागीदार एरिक मेहता ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद उच्च न्यायालय इस बात की जांच कर सकते हैं कि कर न्यायाधिकरण ने सही नियमों का पालन किया है या नहीं। यदि नहीं किया है तो यह एक कानूनी मामला है जिसपर उच्च न्यायालय में मुकदमा चलाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, इस निर्णय से ‘ट्रांसफर प्राइसिंग’ मामले में कानूनी प्रक्रिया के जरिये निर्णय प्राप्त करने में लंबा समय लग सकता है।’’
नांगिया एंडरसन इंडिया के भागीदार (ट्रांसफर प्राइसिंग) नितिन तरंग ने कहा कि शीर्ष अदालत के फैसले का मतलब साफ है कि कानून में ऐसा कुछ नहीं कि सभी मामलों में एक ही विधान लागू हो या साझा आधार पर चीजों को लागू किया जाए।
डेलॉयट इंडिया में भागीदार तरुण अरोड़ा ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है।
उन्होंने कहा कि इस फैसले के बाद, पूर्व में न्यायाधिकरण से अपने पक्ष में फैसला प्राप्त करने वाले करदाताओं को उच्च न्यायालय के समक्ष अपील की कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, अनुभव से पता चलता है कि जब तक इस बात का ठोस आधार नहीं हो कि न्यायाधिकरण के आदेश में गड़बड़ी है, उच्च न्यायालय आमतौर पर ‘ट्रांसफर प्राइसिंग’ मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है। यह स्थिति उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद भी जारी रह सकती है।’’
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