देश की खबरें | तीन भारतीयों ने महिला फिल्म निर्माताओं की मुश्किलों की बात की

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. तीन भारतीय महिला निर्देशकों ने 45वें टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (टीआईएफएफ) में एक उद्योग सम्मेलन पैनल में पुरुष-प्रधान फिल्म उद्योग में पितृसत्ता की बेड़ियों को तोड़ने के संघर्ष पर प्रकाश डाला।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 18 सितम्बर तीन भारतीय महिला निर्देशकों ने 45वें टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (टीआईएफएफ) में एक उद्योग सम्मेलन पैनल में पुरुष-प्रधान फिल्म उद्योग में पितृसत्ता की बेड़ियों को तोड़ने के संघर्ष पर प्रकाश डाला।

फिल्म समीक्षक एवं पत्रकार नमन रामचंद्रन द्वारा संचालित 'वीमेन इन इंडियन सिनेमा' विषयक टीआईएफएफ स्पॉटलाइट का आयोजन टोरंटो में भारतीय वाणिज्य दूतावास के सहयोग से किया गया।

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पैनल में शामिल फिल्मकारों - लीना यादव ("पार्च्ड", "राजमा चावल"), अश्विनी अय्यर तिवारी ("निल बट्टे सन्नाटा", "बरेली की बर्फी", "पंगा") और अभिनेता से निर्देशक बनी तनिष्ठा चटर्जी- ने चुनौतियों के साथ ही बदलती दुनिया में अवसरों पर अपने विचार रखे।

टोरंटो में भारतीय महावाणिज्यदूत अपूर्व श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘हम दो कारणों से इस पहल के साथ साझेदारी करने के लिए सहमत हुए। पहला यह कि महिला निर्देशक एक नए परिप्रेक्ष्य को लाती हैं और दूसरा यह फिल्म उद्योग में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य के अनुरूप है, कैमरे के पीछे और सामने, दोनों ही।’’

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चटर्जी ने कहा कि ‘‘रोम रोम में’’ की शूटिंग के दौरान उनकी टीम की अधिकतर सदस्य महिलाएं थीं जिसमें फोटोग्राफी निर्देशक भी शामिल थीं। इसलिए इसकी शूटिंग के दौरान लैंगिक कोई मुद्दा नहीं था।

उन्होंने कहा कि फिल्म एक ऐसे व्यक्ति के बारे में हैं जिसकी बहन लापता हो जाती है। पुरुष नायक को अपने तलाश अभियान के दौरान अपने स्वयं के गहरे लैंगिक पूर्वाग्रहों का अहसास होता है।

उन्होंने कहा, ‘‘मैं महिलाओं के बारे में एक फिल्म बनाना चाहती थी लेकिन साथ ही पुरुषों में कुछ चीजों को झंकझोरना चाहती थी।’’

यादव ने कहा कि मुंबई में फिल्म के सेट पर कुछ लोग महिलाओं को लेकर ऐसी टिप्पणी करते हैं जिसके बारे में वे नहीं जानते कि वास्तव में उसका अर्थ है क्या।

उन्होंने कहा कि मुंबई उद्योग में आज काफी प्रतिस्पर्धा है कि यदि आप अपने काम में अच्छे हैं तो इसका निर्णय बिना किसी लैंगिग भेदभाव के होता है कि किसे काम दिया जाएगा और किसे नहीं।

अय्यर, तिवारी ने आगरा में पांच वर्ष पहले ‘‘निल बट्टे सन्नाटा’’ की शूटिंग के अनुभव साझा करते हुए कहा, ‘‘स्थानीय प्रोडक्शन के लोगों को महिलाओं से आदेश लेने की आदत पड़ने में थोड़ा समय लगा। यह थोड़ा मुश्किल था लेकिन उन्होंने अंत में इसे स्वीकार कर लिया।’’

यादव ने कहा कि जब वह अपनी फिल्म ‘‘पार्च्ड’’ की शूटिंग के स्थानों की तलाश में थीं तो उन्हें थोड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा, ‘‘जिन गांवों में मैं गई वहां मुझे अनुमति देने से इनकार कर दिया गया क्योंकि मैं एक महिला थी। ग्रामीणों ने कहा कि उनकी महिलाएं मेरी वजह से बिगड़ जाएंगी।’’

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