नयी दिल्ली, 29 जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि सोशल मीडिया या टीवी चैनल की सामग्री पर टिप्पणी करने का अधिकार संविधान के तहत वाक् स्वतंत्रता का एक पहलू है और यह जनता के हित में होगा कि प्रत्येक प्रसारक को दूसरों द्वारा बनाए गए कार्यक्रमों के संबंध में भी आलोचना और समीक्षा का अधिकार हो।
न्यायमूर्ति आशा मेनन ने कहा कि सूचना के व्यापक प्रसार से एक बेहतर जानकार समाज का निर्माण होगा और टिप्पणी करने का अधिकार राष्ट्रीय सुरक्षा, लोक व्यवस्था और मानहानि के लिए खतरे के संबंध में संविधान के तहत उचित प्रतिबंधों के अधीन होना चाहिए।
अदालत ने कहा, ‘‘बेशक, निजता और प्रतिष्ठा के अधिकार का उल्लंघन टिप्पणी करने की स्वतंत्रता की आड़ में नहीं किया जा सकता है।’’
अदालत ने कहा कि इसके अलावा, राय व्यक्त करने का अधिकार स्वतंत्र रूप से सबको उपलब्ध होना चाहिए।
अदालत एक मीडिया हाउस द्वारा ऑनलाइन समाचार पोर्टल ‘न्यूजलॉन्ड्री’ के खिलाफ उसके समाचार प्रसारण और एंकरों का अपनी सामग्री के माध्यम से कथित रूप से उपहास करने के खिलाफ दायर मुकदमे पर एक आदेश पारित करते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने शुक्रवार को वादी मीडिया हाउस को कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया और अंतरिम रोक के उसके आवेदन को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा, ‘‘यह अदालत स्वीकार करेगी कि सोशल मीडिया या टीवी चैनलों पर बनाई गई सामग्री पर टिप्पणी करने के अधिकार को भी अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के एक पहलू के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।’’
अदालत ने कहा कि अंतरिम रोक ऐसे समय मांगी गई है, जब प्रतिद्वंद्वी दावों को उनके गुणदोष के आधार पर निर्धारित किया जाना बाकी है।
उसने कहा, ‘‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में व्यंग्य की कला शामिल होगी, यह स्पष्ट होना चाहिए कि जो पेश किया जा रहा था, वह वास्तव में व्यंग्य है। यह स्वयं स्पष्ट होना चाहिए और उसके स्वरूप से कभी भी कॉपीराइट उल्लंघन या मानहानि या अपमान का मामला नहीं हो सकता है। व्यंग्य की व्याख्या नहीं की जा सकती है, अन्यथा यह अपना विशिष्ट अंदाज खो देगा।’’
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