देश की खबरें | भारत में एंटीरेट्रोवायरल उपचार करा रहे एचआईवी मरीजों की मृत्यु के मामले घटे

नयी दिल्ली, 15 सितंबर भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के एक अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि एचआईवी संक्रमित मरीजों में एंटीरेट्रोवायरल उपचार (एआरटी) का काफी प्रभाव पड़ा है और इसका उपचार करा रहे लोगों में पांच सालों बाद मृत्यु की आशंका आधी हो जाती है।

भारत में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के तहत ‘एंट्रीरेट्रोवायरल उपचार का प्रभाव आकलन’ अध्ययन के मुताबिक जो लोग एआरटी करा रहे होते हैं उनमें तपेदिक (टीबी) होने का भी खतरा इलाज नहीं करा रहे लोगों से कम होता है।

यह रिपोर्ट भारत सरकार के मुफ्त एआरटी कार्यक्रम का राष्ट्रीय स्तर पर पहला एआरटी प्रभाव आकलन (एआरटी-आईई) है।

राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (एनएसीओ) द्वारा कराए गए अध्ययन में 2012-2017 के दौरान देश भर के 396 एआरसी केंद्रों में विभिन्न मानदंडों पर एनएसीपी के एआरटी कार्यक्रम के प्रभाव का आकलन किया गया।

आईसीएमआर ने कहा, “अध्ययन ने एंटीरेट्रोवाइरल उपचार के उच्च प्रभाव का प्रदर्शन किया और प्रदर्शित किया कि पांच साल के उपचार के बाद एआरटी करा रहे लोगों की मृत्यु होने का खतरा घट कर आधा हो गया था। एआरटी नहीं करा रहे लोगों की तुलना में एआरटी करा रहे व्यक्तियों में तपेदिक की संभावना भी कम थी।”

अध्ययन में देखा गया कि 2012 और 2016 में उपचार शुरू कराकर इसे जारी रखने वाले लोगों के समूह की जांच की गई और उनमें से 90 प्रतिशत में पाया गया कि उनके रक्त में वायरस पर्याप्त रूप से दबा हुआ था।

निष्कर्षों के अनुसार, एआरटी के 70 प्रतिशत से अधिक लाभार्थियों ने समग्र रूप से जीवन की गुणवत्ता ‘अच्छी’ या ‘बहुत अच्छी’ होने की बात कही और 82 प्रतिशत उत्पादक रूप से कार्यरत थे और एनएसीपी के तहत एआरटी कार्यक्रम को बहुत प्रभावी पाया गया।

एंटीरेट्रोवाइरल उपचार (एआरटी) एचआईवी संक्रमण के लिए बहुऔषध उपचार है जिसे एनएसीओ द्वारा देश भर में एचआईवी पीड़ित वयस्कों और बच्चों को मुफ्त प्रदान किया जाता है।

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