सुप्रीम कोर्ट ने सेना में शार्ट सर्विस कमीशन वाली महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. इसे लैंगिक असमानता दूर करने की दिशा में अहम माना जा रहा है.भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सेना में शार्ट सर्विस कमीशन के तहत भर्ती होने वाले महिलाओं को स्थायी कमीशन मिलेगा. अदालत ने सेना में महिलाओं के खिलाफ व्यवस्थागत भेदभाव को स्वीकार करते हुए उनके हक में फैसला सुनाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले विशेषाधिकारों का इस्तेमाल किया.
सेना में एसएससी के भर्ती होने वाली महिलाएं अब तक स्थायी कमीशन से वंचित थीं. इसकी वजह से रिटायर होने के बाद उनको पेंशन और भत्ते भी नहीं मिलते थे. अब इन महिला अधिकारियों की सेवा 20 साल के समान मानते हुए उनको समुचित पेंशन और दूसरी सुविधाएं मिलने का रास्ता साफ हो गया है.
सेना में महिलाओं के साथ कथित भेदभाव की शिकायतें तो बहुत पहले से उठ रही थी. इस मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबी लड़ाई के बावजूद इसे पूरी तरह दूर नहीं किया जा सका था. बीते साल कुछ महिला अधिकारियों ने केंद्र की स्थायी कमीशन से जुड़ी वर्ष 2019 की नीतियों और आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के फैसलों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. उनमें 'ऑपरेशन सिंदूर' का हिस्सा रही अधिकारी भी शामिल थीं. याचिका में आरोप लगाया गया था कि शीर्ष अदालत के साफ दिशा-निर्देशों के बावजूद केंद्र और सेना के अधिकारी स्थायी कमीशन देने के मामले में महिलाओं के साथ भेदभाव कर रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले सेना की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट तैयार करने में महिला और पुरुष अधिकारियों में भेदभाव करने का आरोप लगाते हुए इस प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण बताया है. उसका कहना है कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के बाद मंगलवार को अपने फैसले में कहा कि योग्यता की कमी नहीं बल्कि भेदभाव की नीति के कारण ही महिलाओं को सेना में स्थायी कमीशन नहीं मिल सका है. अब शार्ट सर्विस के बाद सेना से हटाई गई महिला अधिकारियों की सेवा भी 20 साल के समान मान कर उनको पेंशन और दूसरी सुविधाएं मिलेंगी.
सेना में महिलाओं की भर्ती
केंद्र सरकार ने वर्ष 1992 में पहली बार शार्ट सर्विस कमीशन के जरिए सेना में महिलाओं की भर्ती का फैसला किया. लेकिन उनको स्थायी कमीशन देने से इंकार कर दिया गया. इसके तहत भर्ती होने वाली महिलाओं की नौकरी दस वर्षों के लिए थी, जिसे चार वर्ष तक बढ़ाया जा सकता था. लेकिन नियमों के मुताबिक ये महिलाएं सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन और दूसरी सुविधाओं की हकदार नहीं थीं.
इसके खिलाफ बबीता पुनिया नामक एक महिला वकील ने वर्ष 2003 में दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी. उसके बाद अगले छह साल में नौ अन्य अधिकारियों ने भी अदालत में अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं. इन मामलों की सुनवाई के बाद 12 मार्च, 2010 में अदालत ने महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के पक्ष में फैसला सुनाया. लेकिन केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दे दी. वहां भी लंबे अरसे तक इस मामले की सुनवाई के बाद 17 फरवरी, 2020 को शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में सभी महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन के लिए योग्य करार दिया.
इसबीच, सरकार ने फरवरी, 2019 में सेना के दस विभागों में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने की नीति तो बनाई लेकिन उसमें यह शर्त जोड़ दी कि इसका फायदा उस साल मार्च से सेना में शामिल होने वाली महिलाओं को ही मिलेगा. इसका नतीजा यह हुआ कि इस मुद्दे पर लंबी अदालती लड़ाई लड़ने वाली महिलाएं इससे वंचित रह गईं.
शीर्ष अदालत में इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की दलील थी कि पुरुष सैनिक या अधिकारी महिला अधिकारी से आदेश लेने के लिए तैयार नहीं होंगे. लेकिन अदालत ने इसके अलावा पुरुषों और महिलाओं की शारीरिक क्षमता में अंतर वाली वाली दलीलों को खारिज कर दिया.
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सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर, 2020 में विभिन्न वजहों से स्थायी कमीशन से वंचित रहने वाली महिला अधिकारियों को नौकरी से नहीं हटाने का निर्देश दिया था. इस फैसले के बाद वर्ष 2021 में सेना में 147 अन्य अधिकारियों को भी स्थायी कमीशन मिला था. उसके बाद बीते साल अगस्त से सुप्रीम कोर्ट ने सेना में शार्ट सर्विस कमीशन वाली अधिकारियों के साथ नीतिगत भेदभाव की शिकायतों की सुनवाई शुरू की थी. उसी पर अदालत ने यह फैसला सुनाया है. अब 14 साल की सेवा पूरी करने वाली तमाम अधिकारियों को स्थायी कमीशन मिलेगा. इसके साथ ही सेना में हर साल 250 महिला अधिकारियों को ही स्थायी कमीशन देने की सीमा को भी अवैध बताते हुए उसे खारिज कर दिया है.
लैंगिक बराबरी के समर्थक मानते हैं 'मील का पत्थर'
महिला कार्यकर्ताओं और विश्लेषकों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को 'मील का पत्थर' बताते हुए कहा है कि इससे सेना में महिलाओं को भी पुरुष अधिकारियों की तरह आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर मिलेंगे. लेकिन उन्होंने साथ ही जमीनी स्तर पर इस फैसले के लागू होने पर आशंका भी जताई है.
महिला सशक्तिकरण के हित में काम करने वाले एक गैर-सरकारी संगठन 'आशार आलो' (उम्मीद की रोशनी) से जुड़ी महिला कार्यकर्ता छंदा चटर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "सेना में महिलाओं के प्रति शुरू से ही पूर्वाग्रह रहा है. सिर्फ अदालत के फैसले से ही तस्वीर नहीं बदलेगी. इसके लिए पुरुष अधिकारियों की सोच भी बदलनी होगी."
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वरिष्ठ एडवोकेट सुष्मिता बाउरी डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, "सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मील का पत्थर है. लेकिन क्या इससे भेदभाव तुरंत खत्म हो जाएगा? इस फैसले को जमीनी स्तर पर लागू करना जरूरी है." उनका कहना था कि महिला अधिकारियों ने लंबी कानून लड़ाई के बाद यह जीत हासिल की है. अब देखना यह है कि क्या पुरुषों के वर्चस्व वाली सेना इसे जमीनी स्तर पर लागू करने की इच्छाशक्ति दिखाएगी? केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट को भी इसकी निगरानी करनी चाहिए.
राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "सेना में भेदभाव के खिलाफ महिलाओं की यह लड़ाई बहुत पुरानी है. शायद अब शीर्ष अदालत के फैसले के बाद तस्वीर में कुछ बदलाव हो."













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