विदेश की खबरें | नये दृष्टिकोण की कमी के कारण कंजर्वेटिव पार्टी के लिए अगला चुनाव बेहद मुश्किल हो सकता है
श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

लंदन, छह अगस्त (द कन्वरसेशन) ब्रिटेन में कंजर्वेटिव पार्टी के लिए देश के नये प्रधानमंत्री का चुनाव करना एक कड़ी चुनौती है। ऐसा इसलिए क्योंकि नये दृष्टिकोण की कमी होने के अलावा पार्टी के सामने कई अन्य चुनौतियां भी हैं। इससे कंजर्वेटिव पार्टी के लिए अगला चुनाव जीतना भी बेहद कठिन हो सकता है।

ब्रिटेन में अगले चुनाव के मद्देनजर मतदाताओं के सामने सबसे बड़ा मुद्दा बढ़ती हुई महंगाई है। मतदान करते समय उनके समक्ष यह सबसे प्रमुख मुद्दा होगा।

ब्रिटेन में ऊर्जा की कीमतों में भारी वृद्धि के कारण लोगों को गंभीर आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कठिनाइयों का सामना कर रहे लोगों के बीच उनके भुगतान से लाभ कमाने वाली उपयोगिता कंपनियों के प्रति नाराजगी बढ़ती ही जा रही है।

एक सामान्य समझ यह है कि पार्टी को बेहतर वैचारिक नवीनीकरण की आवश्यकता है। कंजर्वेटिव पार्टी का नया नेता एक नया चेहरा और नया नजरिया पेश करना चाहेगा।

हालांकि, लिज़ ट्रस और ऋषि सुनक दोनों ही बोरिस जॉनसन के अधीन काम कर चुके हैं। यदि पार्टी एक नये सकारात्मक दृष्टिकोण को नहीं अपनाती है तो उसे पुनर्जीवित करने के सभी प्रयास बेकार चले जाएंगे।

लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टियां अक्सर पतन के संकट का सामना करती हैं।

सरकार में नेता बदलकर पार्टी को नया स्वरूप देने का प्रयास किया जा सकता है, जैसा कि टोरीज़ ने 1990 में और लेबर पार्टी ने 2007 में किया था।

लेकिन, पार्टी के भीतर आंतरिक फूट की मूलभूत समस्याएं, बैकबेंचरों को पदोन्नति के टूटे वादों पर नाराजगी और दूरदर्शी दृष्टिकोण की कमी पार्टी को मजबूत बनाने के प्रयासों को विफल कर सकती है।

अमूमन ऐसा होता है कि पुराने नेता जिन समस्याओं का सामना कर रहे होते हैं, नये नेता को भी उन समस्याओं का सामना करना होता है और वे उसी के बोझ तले दबते चले जाते हैं।

सत्ता में एक दशक से अधिक समय के बाद यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि कंजर्वेटिव पार्टी के सदस्य कैसे चीजों को बदल सकते हैं और अगले आम चुनाव में एक सकारात्मक दृष्टिकोण के बिना जनादेश के साथ कैसे वापस लौट सकते हैं।

मौजूदा समय में ब्रिटेन की सरकार अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिशों में जुटी हुई हैं। सरकार को कुछ सामाजिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। कंजर्वेटिव पार्टी के सामने दुनिया के सामने ब्रिटेन की स्थिति को मजबूत करने की भी चुनौती है।

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