देश की खबरें | मप्र सरकार ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने में जल्दबाजी नहीं करने का न्यायालय से आग्रह किया

नयी दिल्ली, तीन मई मध्य प्रदेश सरकार ने उच्चतम न्यायालय से बुधवार को अनुरोध किया कि वह समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने में जल्दबाजी नहीं करे और अगले कदम के बारे में फैसला संसद पर छोड़ दे, अन्यथा पूरा सामाजिक तानाबाना तार-तार हो सकता है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्य का न्यायालय में प्रतिनिधित्व कर रहे वकील ने कहा कि बदलाव को स्वीकार करने के लिए समाज का तैयार होना जरूरी है।

प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग करने वाली याचिकाओं के एक समूह पर सातवें दिन सुनवाई कर रही थी। न्यायालय केंद्र के अलावा, याचिकाओं का विरोध कर रहे कुछ राज्यों की दलीलें सुन रहा है।

पीठ के सदस्यों में न्यायमूर्ति एस के कौल, न्यायमूर्ति एस आर भट, न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा भी शामिल हैं।

मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि ये याचिकाएं विशेष विवाह अधिनियम में आमूलचूल बदलाव करने के लिए दायर की गई हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘संसद, जिसके हाथों में जनता की नब्ज है, अगला कदम उठाने के बारे में फैसला करने और इसका समय तय करने के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थिति में है...इसे थोपे नहीं, अन्यथा पूरा सामाजिक तानाबाना तार-तार हो जाएगा। हम नहीं जानते कि क्या परिणाम होगा। इस तरह के विषयों में तेजी से नहीं, बल्कि धीमी गति से आगे बढ़ना सही रहता है।’’

उन्होंने कहा कि बदलाव स्वीकार करने के लिए समाज का तैयार होना भी समान रूप से जरूरी है और ‘‘इसलिए हमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।’’

द्विवेदी ने कहा कि इस मामले पर सामाजिक अनुकूलन की जरूरत है और केवल संसद ही इस पर फैसला करने की स्थिति में है कि कैसे और कब अगला कदम उठाना है।

पीठ ने द्विवेदी से सवाल किया कि यदि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दी जाती है तो पुरुष-महिला दंपती की गरिमा कैसे प्रभावित होगी।

उन्होंने जवाब दिया, ‘‘क्योंकि प्राचीन काल से ही पति और पत्नी के बीच एक उद्देश्यपूर्ण संबंध है।’’

पीठ ने कहा, ‘‘तो क्या आप यह कह रहे हैं कि विवाह को पुरुष-महिला दंपती के बीच एक संयोजन समझा जाए। और इससे अलग किसी चीज को मान्यता देकर आप(न्यायालय) पारंपरिक मूल्यों को प्रभावित कर रहे हैं।’’

न्यायालय ने कहा कि संविधान में मूल अधिकारों को लागू करने के प्रावधान हैं, जो समलैंगिक जोड़ों को भी उपलब्ध हैं और उनका अस्तित्व ऐसी कोई चीज नहीं है जो किसी दूसरे जगह से लाया गया हो, बल्कि यह भारतीय समाज का हिस्सा है।

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