देश की खबरें | विधि आयोग ने किया था आगाह: धार्मिक रिवाजों के रूप में आश्रय पाती हैं कई सामाजिक बुराइयां

नयी दिल्ली, 15 जून पिछले विधि आयोग ने करीब पांच साल पहले आगाह किया था कि सती, बाल विवाह और तीन तलाक जैसी कई सामाजिक बुराइयां धार्मिक रीति-रिवाजों के रूप में आश्रय पाती हैं और कानून के तहत 'धर्म' के रूप में उनके बचाव की मांग करना गंभीर मूर्खता होगी।

राजनीतिक रूप से संवेदनशील यह विषय एक बार फिर विमर्श में आ गया है क्योंकि 22वें विधि आयोग ने बुधवार को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर नए सिरे से चर्चा शुरू की।

अगस्त, 2018 में 21वें विधि आयोग ने इसी विषय पर विचार करने के लिए "परिवार कानून में सुधार" पर एक परामर्श पत्र जारी किया था।

मौजूदा विधि आयोग ने एक सार्वजनिक सूचना में कहा, "चूंकि उक्त परामर्श पत्र तीन साल से भी पहले जारी हुआ था, ऐसे में विषय की प्रासंगिकता और महत्व को ध्यान में रखते हुए और इस विषय पर विभिन्न अदालती आदेशों पर भी गौर करते हुए, भारत के 22वें विधि आयोग ने इस विषय पर नए सिरे से विचार-विमर्श करना उचित समझा।"

परामर्श पत्र में कहा गया था कि यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि कई सामाजिक बुराइयां धार्मिक रीति-रिवाजों के रूप में शरण लेती हैं। ‘‘... इनमें सती, गुलामी, देवदासी, दहेज, तीन तलाक, बाल विवाह जैसी बुराइयां शामिल हैं। धर्म के रूप में कानून के तहत उनके बचाव की मांग करना गंभीर मूर्खता होगी।"

परामर्श पत्र में कहा गया था कि ऐसी प्रथाएं न तो मानवाधिकारों के बुनियादी सिद्धांतों के अनुरूप हैं और न ही ये धर्म के लिए आवश्यक हैं। उसमें कहा गया था कि धर्म के लिए आवश्यक होने पर भी कोई प्रथा अगर भेदभावपूर्ण है तो उसे कायम रखने का कोई कारण नहीं होना चाहिए।

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