देश की खबरें | उच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता की वकालत की, सभी धर्मों की महिलाओं के लिए समानता पर जोर दिया

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. कर्नाटक उच्च न्यायालय ने संसद और राज्य विधानमंडलों से एक ऐसा कानून बनाने के लिए ठोस प्रयास करने का आग्रह किया है, जिससे समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू हो सके। न्यायालय ने सभी नागरिकों, विशेषकर महिलाओं के लिए समानता, धर्मनिरपेक्षता और न्याय के संवैधानिक दृष्टिकोण को कायम रखने में इसके महत्व पर जोर दिया।

बेंगलुरु, पांच अप्रैल कर्नाटक उच्च न्यायालय ने संसद और राज्य विधानमंडलों से एक ऐसा कानून बनाने के लिए ठोस प्रयास करने का आग्रह किया है, जिससे समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू हो सके। न्यायालय ने सभी नागरिकों, विशेषकर महिलाओं के लिए समानता, धर्मनिरपेक्षता और न्याय के संवैधानिक दृष्टिकोण को कायम रखने में इसके महत्व पर जोर दिया।

यह महत्वपूर्ण अनुशंसा न्यायमूर्ति हंचाटे संजीव कुमार की अध्यक्षता वाली एकल पीठ द्वारा एक दिवंगत मुस्लिम महिला शहनाज बेगम के पति और भाई-बहन के बीच संपत्ति विवाद से संबंधित एक दीवानी अपील पर फैसला सुनाते हुए की गई।

इस मामले ने व्यक्तिगत धार्मिक कानूनों द्वारा शासित उत्तराधिकार कानूनों और लैंगिक न्याय पर उनके निहितार्थों के बारे में व्यापक प्रश्न उठाए।

न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता के अधिनियमन से प्रस्तावना में निहित आदर्शों - अर्थात न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और राष्ट्रीय एकता को पूरा किया जा सकेगा।

अदालत ने चार अप्रैल को अपनी टिप्पणी में कहा, ‘‘देश को पर्सनल लॉ और धर्म के संबंध में एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है’’।

इसने कहा, ‘‘तभी भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उद्देश्य प्राप्त होगा।’’

न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि देशभर में महिलाओं को संविधान के तहत समान अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन धर्म आधारित व्यक्तिगत कानूनों के कारण उनके साथ असमान व्यवहार किया जाता है।

पीठ ने इस असमानता को स्पष्ट करने के लिए हिंदू और मुस्लिम व्यक्तिगत कानूनों के तहत उत्तराधिकार अधिकारों की तुलना की। जहां हिंदू कानून बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देता है, वहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ भाइयों और बहनों के बीच अंतर करता है - भाइयों को ‘हिस्सेदार’ का दर्जा देता है, जबकि बहनों को तुलनात्मक रूप से कम हिस्सा मिलता है।

इस बात पर गौर करते हुए कि गोवा और उत्तराखंड जैसे राज्य पहले ही समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में कदम उठा चुके हैं, न्यायालय ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वह उसके निर्णय की एक प्रति केन्द्र सरकार और कर्नाटक सरकार के प्रधान विधि सचिवों को भेजें, ताकि ऐसी संहिता लागू करने की दिशा में विधायी प्रयास शुरू किए जा सकें।

न्यायालय ने प्रतिष्ठित नेताओं और संविधान निर्माताओं द्वारा समान नागरिक संहिता के लिए दिए गए ऐतिहासिक समर्थन की ओर भी ध्यान आकर्षित किया।

अदालत ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, टी. कृष्णमाचारी और मौलाना हसरत मोहानी के भाषणों का हवाला दिया है, जिसमें राष्ट्रीय एकता और समानता को बढ़ावा देने के लिए समान नागरिक कानूनों के प्रति उनके समर्थन को रेखांकित किया गया है।

अदालत समीउल्ला खान और अन्य द्वारा दायर अपीलों पर फैसला सुना रही थी, जिन्होंने अपनी बहन शहनाज बेगम द्वारा छोड़ी गई संपत्तियों के बंटवारे को चुनौती दी है।

वादियों - दो भाई और एक बहन - ने दावा किया कि विचाराधीन दोनों संपत्तियां (जिन्हें अनुसूची ‘ए’ और अनुसूची ‘बी’ कहा गया है) दिवंगत महिला द्वारा स्वयं अर्जित की गई थीं इसलिए महिला के पति (प्रतिवादी) के साथ-साथ सभी तीन वादी 50-50 अनुपात में संपत्ति के बंटवारे में समान रूप से हकदार हैं।

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