नयी दिल्ली, 14 फरवरी उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को उस अधिसूचना के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें त्रिपुरा के सरकारी विभागों में नौकरियों के लिए आवेदन के संबंध में स्थायी निवासी प्रमाण पत्र अनिवार्य कर दिया गया था।
न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने याचिका पर गौर करने में अपनी अनिच्छा दिखाई और याचिकाकर्ता से अपनी शिकायत के साथ उच्च न्यायालय जाने को कहा, जिसके बाद वकील ने याचिका वापस ले ली।
पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा, ‘‘क्या त्रिपुरा उच्च न्यायालय अवकाश पर है?’’ वकील ने दलील दी कि अधिसूचना में कहा गया है कि राज्य सरकार के विभागों और अर्द्ध-सरकारी निकायों में नौकरियों के लिए आवेदन के संबंध में त्रिपुरा का स्थायी निवासी प्रमाण पत्र आवश्यक है।
उन्होंने शीर्ष अदालत के हाल के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि राज्य द्वारा स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों में डोमिसाइल (मूल निवास)-आधारित आरक्षण असंवैधानिक है। पीठ ने पूछा, ‘‘आप इन सभी मुद्दों को उच्च न्यायालय के समक्ष क्यों नहीं उठाते? आप उच्च न्यायालय क्यों नहीं जाते?’’
जब याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि यह मामला कानून के बड़े सवालों से जुड़ा है, तो पीठ ने पूछा, ‘‘क्या उच्च न्यायालयों को इन पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं है?’’ इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने उच्च न्यायालय में जाने की स्वतंत्रता के साथ याचिका वापस ले ली।
वकील ने पीठ के समक्ष सूचीबद्ध एक अलग याचिका का हवाला दिया और अधिसूचना से संबंधित मामले में त्रिपुरा उच्च न्यायालय के फरवरी 2024 के आदेश को चुनौती दी।
उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय ने राज्य के महाधिवक्ता की इस दलील पर गौर किया कि त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद एक स्वतंत्र इकाई/स्वायत्त निकाय है और ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है जिसके तहत उन्होंने सरकारी अधिसूचना को अपनाया हो।
पीठ ने यह कहते हुए याचिका का निपटारा कर दिया, ‘‘जब कोई संवैधानिक प्राधिकारी अदालत के समक्ष बयान देता है, तो अधिकारी उसका पालन करने के लिए बाध्य होते हैं।’’
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