देश की खबरें | अदालत ने पंजीकृत और नई सोसाइटी का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने की सलाह दी

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नयी दिल्ली, 15 दिसंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोसाइटी का एक ऐसा राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का आह्वान किया है, जिसकी मदद से देशभर के सभी पंजीयक मौजूदा पंजीकृत सोसाइटी और नई सोसाइटी की पंजीकरण स्वीकृति संबंधी जानकारी हासिल कर सकें।

अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि सोसाइटी के पंजीयक भी एक प्राधिकारी के रूप में इस बात को लेकर संशय में हैं कि क्या उनके पास पंजीकरण रद्द करने की ताकत है या नहीं और यह संशय विभिन्न रिट याचिकाओं में उनके अलग अलग रुख से प्रतिबिंबित होता है।

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह की एकल पीठ ने कहा कि अदालत का यह मानना है कि सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 में संशोधन पर विचार करने की तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि यह दिल्ली पर लागू होता है। इसमें तीसरे पक्ष के अधिकारों की रक्षा करने के प्रावधान शामिल करने की आवश्यकता है, जिन्हें किसी एक विशेष सोसाइटी के पंजीकरण की स्वीकृति को लेकर शिकायत हो सकती है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि सोसाइटी का पंजीयक एक ऐसा प्राधिकरण होना चाहिए, जो कम से कम इस बुनियादी जांच के बाद किसी सोसाइटी के पंजीकरण को मंजूरी देने की जिम्मेदारी निभाए कि उसके जैसे नाम वाली कोई सोसाइटी पहले से तो नहीं है।

अदालत ने कहा, ‘‘इसके लिए, सोसाइटी का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार किया जा सकता है और देशभर में सभी पंजीयकों तक इसकी पहुंच मुहैया कराई जा सकती है, ताकि वे नई सोसाइटी का पंजीकरण करते हुए मौजूदा पंजीकृत सोसाइटी के बारे में पता कर सके।’’

उसने कहा कि फैसले की एक प्रति प्रमुख सचिव (कानून, न्याय और विधायी मामले), दिल्ली सरकार और भारत सरकार के कानून एवं न्याय मंत्रालय के सचिव को उपरोक्त मुद्दों पर विचार करने और उचित कदम उठाने के लिए भेजी जाए।’’

अदालत ने सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम के तहत समान नाम वाले संगठनों के पंजीकरण को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं को खारिज करते हुए फैसला सुनाया। अदालत इस सवाल पर विचार कर रही थी कि क्या सोसाइटी के पंजीयक के पास अधिनियम के तहत किसी सोसाइटी का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार है या नहीं।

अधिनियम की वैधानिक योजना पर विचार कर रही अदालत का मानना था कि दिल्ली में पंजीयक को किसी सोसाइटी के पंजीकरण को रद्द करने की अनुमति देने वाला कोई संशोधन लागू नहीं किया गया है।

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