देश की खबरें | शिकायतकर्ता से आरोपी कर सकता है जिरह: उच्च न्यायालय

बेंगलुरु, नौ अक्टूबर कर्नाटक उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि आरोपी शिकायतकर्ता से जिरह करने के अधिकार का दावा कर सकता है, भले ही उसने अंतरिम क्षतिपूर्ति जमा नहीं कर आदेश का उल्लंघन किया हो।

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘ जिरह का अधिकार एक महत्वपूर्ण अधिकार है। किसी मामले को खासकर इस आधार पर बंद नहीं किया जा सकता है तथा आरोपी को शिकायतकर्ता से जिरह करने से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसने अंतरिम क्षतिपूर्ति रकम का भुगतान नहीं किया है।’’

कोलार के होहाल्ली गांव के मुरली तथा कोलार के किलारिपेट के वेंकेटेशप्पा के बीच पैसों का लेन-देन हुआ था। मुरली का 10 लाख रूपये का चेक नहीं भुन पाया था जिससे आपराधिक मामला बना था।

मजिस्ट्रेट अदालत ने मुरली को सुनवाई के लंबित रहने तक उस रकम का दस फीसद हिस्सा क्षतिपूर्ति के रूप में जमा करने का आदेश दिया था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। मजिस्ट्रेट अदालत ने वेंकेटेशप्पा से जिरह करने के उसके आवेदन को मंजूर नहीं किया था।

तब मुरली उच्च न्यायालय चला गया। अदालत ने मुरली के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा, ‘‘ 10 जनवरी, 2022 के अपने आदेश में विद्वान मजिस्ट्रेट ने अंतरिम मुआवजे के दस फीसद के भुगतान के आधार पर जिरह से वंचित कर भारी गलती की है।’’

मजिस्ट्रेट ने उच्च न्यायालय की अन्य पीठ के फैसले का पालन किया था। लेकिन न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना ने 25 अगस्त के अपने फैसले में व्यवस्था दी कि यह नूर मोहमद बनाम खुर्रम पाशा मामले में शीर्ष अदालत के फैसले के विरूद्ध है। उच्चतम न्यायालय के फैसले का विशद विवरण पेश करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘ शीर्ष अदालत स्पष्ट रूप से व्यवस्था देती है कि यदि अंतरिम मुआवजा नहीं दिया जाता है तो उसे जुर्माने के तौर पर वसूला जा सकता है।’’

उच्च न्यायालय ने कहा कि जिरह का अधिकार वापस नहीं लिया जा सकता है। उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘यह आम कानून है कि जिरह का अधिकार आरोपी का मूल्यवान अधिकार है। ऐसे मूल्यवान अधिकार को अंतरिम क्षतिपूर्ति के भुगतान की शर्त पर वापस नहीं लिया जा सकता क्योंकि उसके लिए कानून में अपने आप में उपचारात्मक उपाय है। ऐसे उपाय का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।’’

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