नयी दिल्ली, 28 जुलाई भारत में वर्तमान में इस्तेमाल की जाने वाली मौसम पूर्वानुमान तकनीकों को लागू करने से श्रीलंका में बाढ़ और भूस्खलन के बारे में बेहतर ढंग से अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है। एक अध्ययन में यह बात कही गई है।
‘जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स’ में बृहस्पतिवार को प्रकाशित इस अध्ययन के निष्कर्षों से बाढ़ और भूस्खलन के प्रति बेहद संवेदनशील श्रीलंका में भारी बारिश से निपटने के लिए बेहतर तैयारी करने में मदद मिल सकती है।
अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि मई 2017 में श्रीलंका में मानसूनी बारिश के कारण आई बाढ़ से 150 से अधिक लोग मारे गए थे।
ब्रिटेन में रीडिंग विश्वविद्यालय के अक्षय देवरस ने कहा, ‘‘विनाशकारी बाढ़ और प्रतिकूल मौसम की घटनाओं के प्रति बेहद संवेदनशील होने के बावजूद, श्रीलंका को अनुसंधानकर्ताओं द्वारा बड़े पैमाने पर नजरअंदाज किया गया है और भविष्य में जलवायु परिवर्तन से इसके अधिक प्रभावित होने की आशंका है।’’
देवरस ने कहा, ‘‘हमारा अध्ययन यह प्रदर्शित करने वाला पहला अध्ययन है कि भारत में मौसम पूर्वानुमान को बेहतर बनाने के लिए पहले से ही इस्तेमाल की जा रही तकनीकों का इस्तेमाल श्रीलंका में भी प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाले लोग सक्रिय रूप से हवा के व्यापक स्वरूप की निगरानी कर रहे हैं जो उन्हें यह अनुमान लगाने में मदद कर सकता है कि आगे क्या होगा। हमने हवा के एक विशिष्ट स्वरूप की पहचान की है जो श्रीलंका में अत्यधिक बारिश के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है।’’
अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि मौसम के मिजाज और अत्यधिक बारिश के बीच संबंध को समझना श्रीलंकाई समुदायों को घातक प्राकृतिक आपदाओं के लिए तैयार होने में मदद करने के लिए वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण है और इससे लोगों की जान बचाई जा सकती है।
अध्ययन में पाया गया कि श्रीलंका में अत्यधिक बारिश उत्तर-पूर्वी मानसून (दिसंबर-फरवरी) और दूसरे मानसून सत्र (अक्टूबर-नवंबर) के दौरान सबसे अधिक बार होती है।
अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि अग्रणी मौसम पूर्वानुमान मॉडल एक या दो सप्ताह पहले ही मैडेन-जूलियन ऑसीलेशन (एमजेओ) के स्थान की सटीक भविष्यवाणी कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह उम्मीद की जाती है कि इस अध्ययन के निष्कर्षों से एमजेओ के साथ इसके संबंध को देखते हुए, श्रीलंका में अत्यधिक बारिश के बारे में अधिक बेहतर तरीके से अनुमान लगाया जा सकेगा।
एमजेओ एक समुद्री-वायुमंडलीय घटना है जो दुनिया भर में मौसम की गतिविधियों को प्रभावित करती है।
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