देश की खबरें | तमिलनाडु : वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता एन. शंकरैया का निधन

चेन्नई, 15 नवंबर स्वतंत्रता सेनानी और अनुभवी मार्क्सवादी नेता एन. शंकरैया का बुधवार को चेन्नई में निधन हो गया। वह 101 वर्ष के थे।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के संस्थापक सदस्य ‘कॉमरेड’ शंकरैया ने चेन्नई के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली।

मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने लोगों के लिए शंकरैया की उत्कृष्ट सेवा को याद करते हुए उनकी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि दमन के खिलाफ आजीवन लड़ने वाले शंकरैया का जीवन और बलिदान हमेशा इतिहास के पन्नों में दर्ज रहेगा। उनका ‘‘जीवन बलिदानों से युक्त था।’’

स्टालिन ने घोषणा की कि शंकरैया का अंतिम संस्कार एक स्वतंत्रता सेनानी, एक विधायक और एक राजनीतिक दल के नेता के रूप में उनकी सेवा को देखते हुए राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने घोषणा की थी कि शंकरैया को राज्य संचालित मदुरै कामराज विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया जाएगा, लेकिन तमिलनाडु के स्वतंत्रता संग्राम इतिहास से अंजान कुछ ‘संकीर्ण मानसिकता वाले’ लोगों की ‘साजिश’ के कारण ऐसा नहीं किया जा सका।

उन्होंने परोक्ष रूप से राज्यपाल आर.एन. रवि का संदर्भ दिया जिन्होंने कुलाधिपति के तौर पर डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान करने की मंजूरी नहीं दी।

तीन बार विधायक रहे शंकरैया ने मार्क्सवादी पार्टी से संबद्ध अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष और महासचिव के रूप में भी काम किया था।

वह 1995 से 2002 तक माकपा के तमिलनाडु राज्य सचिव थे और वह किसान निकाय की राज्य समिति के प्रमुख भी रहे थे।

देश में वामपंथी आंदोलन के सबसे बड़े नेताओं में से एक शंकरैया का जन्म 15 जुलाई 1922 को तमिलनाडु के कोविलपट्टी में हुआ था और उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था।

मदुरै के अमेरिकन कॉलेज में जब वह स्नातक की पढ़ाई कर रहे थे तब उन्होंने छात्रों को संगठित किया।

स्नातक अंतिम वर्ष की परीक्षा से महज 15 दिन पहले उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के लिए एहतियातन हिरासत में ले लिया गया जिसकी वजह से वह स्नातक की उपाधि कभी प्राप्त नहीं कर सके।

मदुरै षडयंत्र मामले सहित कई मामलों में वह जेल गए और 14 अगस्त 1947 तक कारागार में ही रहे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान करीब पांच साल कारावास में बिताये। देश आजाद होने के बाद लोगों की समस्या को सामने रखने की वजह से उन्हें करीब चार साल तक जेल में रहना पड़ा।

शंकरैया ने स्वत्रंता सेनानियों को मिलने वाली पेंशन भी लेने से मना कर दिया। अंग्रेजी और तमिल के जानकार शंकरैया ने मदुरै के मंदिरों में प्रवेश और हिंदी विरोधी आंदोलन में भी हिस्सा लिया।

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