देश की खबरें | राज्यों के पास औद्योगिक अल्कोहल को विनियमित करने के लिए नहीं है विधायी शक्ति: न्यायमूर्ति नागरत्ना

नयी दिल्ली, 23 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने बहुमत के फैसले से असहमति जताते हुए बुधवार को कहा कि राज्यों के पास औद्योगिक अल्कोहल के उत्पादन, विनिर्माण और आपूर्ति को विनियमित करने के लिए विधायी शक्ति नहीं है।

प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने सात अन्य न्यायाधीशों के साथ 8:1 के बहुमत से दिए गए फैसले में कहा कि राज्यों के पास औद्योगिक अल्कोहल पर नियामक शक्ति होगी। पीठ ने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची की प्रविष्टि 8 में ‘‘मादक शराब’’ वाक्यांश के दायरे में औद्योगिक अल्कोहल भी शामिल होगा।

न्यायमूर्ति नागरत्ना 238 पन्नों के असहमति वाले फैसले में कहा कि सिर्फ इसलिए कि औद्योगिक अल्कोहल को एक प्रक्रिया द्वारा पेय पदार्थ के रूप में मानव उपभोग के लिए अल्कोहल में परिवर्तित किया जा सकता है, इससे राज्य विधानमंडल को उस पर कर लगाने या उसे विनियमित करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

उन्होंने कहा, ‘‘विकृत अल्कोहल औद्योगिक अल्कोहल की श्रेणी से संबंधित है, इसलिए उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम (आईडीआरए) की धारा 18जी उक्त उत्पाद पर लागू होती है।’’

न्यायाधीश ने कहा कि धारा 18जी प्रविष्टि 33(ए)- सूची तीन के अंतर्गत आती है, इस प्रकार, केवल संसद ही अनुसूचित उद्योग, अर्थात् किण्वन उद्योग से संबंधित सभी वस्तुओं या वस्तुओं के एक वर्ग पर कानून बनाने के लिए सक्षम है।

न्यायाधीश ने कहा कि संसद द्वारा प्रविष्टि 52- सूची एक के आधार पर लागू आईडीआरए ने किण्वन उद्योगों को अनुसूचित उद्योग के रूप में नियंत्रित किया है। उन्होंने कहा कि ऐसे किण्वन उद्योगों में मादक शराब को शामिल नहीं किया जाएगा।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘सूची दो की प्रविष्टि 8 के अनुसार राज्यों को ‘‘मादक शराब’’ को विनियमित करने की शक्ति है, जो पेय पदार्थ के रूप में मानव उपभोग के लिए है और इस संबंध में राज्यों को पेय पदार्थ के रूप में मानव उपभोग के लिए ‘औद्योगिक अल्कोहल’ को शराब में परिवर्तित करने पर रोक लगाने की शक्ति है।’’

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘यह नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए है, जो संविधान के अनुच्छेद 47 के तहत राज्य का नीति निर्देशक सिद्धांत है और राज्य में उत्पादित ‘औद्योगिक शराब’ के अनधिकृत उपयोग/दुरुपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए है, ताकि इसे पेय पदार्थ के रूप में मानव उपभोग के लिए ‘मादक शराब’ के रूप में ना तो परिवर्तित किया जा सके और न बेचा जा सके।’’

संविधान की 7वीं अनुसूची के अंतर्गत राज्य सूची की प्रविष्टि आठ, राज्यों को ‘‘मादक शराब’’ के निर्माण, कब्जे, परिवहन, खरीद और बिक्री पर कानून बनाने का अधिकार देती है। वहीं संघ सूची की प्रविष्टि 52 और समवर्ती सूची की प्रविष्टि 33 में उन उद्योगों का उल्लेख है जिनके नियंत्रण को ‘‘संसद ने कानून द्वारा सार्वजनिक हित में समीचीन घोषित किया है।’’

संसद और राज्य विधानमंडल दोनों समवर्ती सूची में उल्लिखित विषयों पर कानून बना सकते हैं, लेकिन केंद्रीय कानून को राज्य कानून पर प्राथमिकता दी जाएगी। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्य सरकारों ने सात न्यायाधीशों की पीठ के फैसले और केंद्र के इस रुख को चुनौती दी थी कि औद्योगिक शराब पर उसका विशेष नियंत्रण है।

सात न्यायाधीशों की पीठ ने 1990 में कहा था कि उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 के माध्यम से संघ ने इस विषय पर विधायी शक्ति हासिल करने की स्पष्ट मंशा व्यक्त की है, इसलिए प्रविष्टि 33 राज्य सरकार को सशक्त नहीं बना सकती।

सात न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था कि औद्योगिक अल्कोहल के उत्पादन पर नियामक अधिकार केंद्र के पास है। 2010 में यह मामला नौ न्यायाधीशों की पीठ को सौंपा गया था।

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