नयी दिल्ली, 29 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि मादक पदार्थ कानून के तहत नशीले पदार्थों के सेवन और तस्करी के मामलों में आरोपियों द्वारा जांच अधिकारियों के समक्ष दिए गए इकबालिया बयानों का उन्हें दोषी ठहराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपियों द्वारा जांच अधिकारियों के समक्ष दिये गये बयानों का उन्हें दोषी ठहराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह जीवन के मौलिक अधिकारों, समानता और आत्म-दोषारोपण के खिलाफ संरक्षण का ‘‘उल्लंघन’’ होगा।
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न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों की एक पीठ ने 2 : 1 के बहुमत से स्वापक औषधि और मन-प्रभावी पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस) के विभिन्न प्रावधानों का विश्लेषण किया और कहा कि मादक पदार्थ मामले में आरोपियों द्वारा दिये गये इकबालिया बयानों का इस्तेमाल आरोपी को दोषी ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति नरीमन और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा निष्कर्षों पर सहमत हुए जबकि पीठ की तीसरी न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी असहमत थीं।
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न्यायालय ने बहुमत वाले अपने 163 पृष्ठ के फैसले में कहा, ‘‘“एनडीपीएस अधिनियम की धारा 67 के तहत दर्ज एक बयान को एनडीपीएस अधिनियम के तहत अपराध की सुनवाई में एक इकबालिया बयान के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।’’
एनडीपीएस अधिनियम की धारा 67 सूचना मांगने के लिए अधिकारी के अधिकार से संबंधित है।
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