जरुरी जानकारी | रिजर्व बैंक मौद्रिक समीक्षा बैठक में रेपो दर में कर सकता है 0.25 प्रतिशत की एक और कटौतीः विशेषज्ञ

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस सप्ताह अपनी मौद्रिक समीक्षा बैठक में प्रमुख नीतिगत दर रेपो में एक बार फिर से 0.25 प्रतिशत तक की कटौती कर सकता है। मुद्रास्फीति में कमी से केंद्रीय बैंक के पास ब्याज दर में कटौती की गुंजाइश है।

मुंबई, छह अप्रैल भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस सप्ताह अपनी मौद्रिक समीक्षा बैठक में प्रमुख नीतिगत दर रेपो में एक बार फिर से 0.25 प्रतिशत तक की कटौती कर सकता है। मुद्रास्फीति में कमी से केंद्रीय बैंक के पास ब्याज दर में कटौती की गुंजाइश है।

अमेरिका की तरफ से जवाबी सीमा शुल्क लगाने की घोषणा के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौतियां पैदा हो गई हैं। ऐसे में घरेलू मोर्चे पर भी आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहन देने की जरूरत महसूस की जा रही है।

फरवरी में गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​​​की अध्यक्षता वाली आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने रेपो दर को 0.25 प्रतिशत घटाकर 6.25 प्रतिशत कर दिया था। यह मई, 2020 के बाद रेपो दर में पहली कटौती और ढाई साल के बाद पहला संशोधन था।

एमपीसी की 54वीं बैठक सात अप्रैल से शुरू होगी। बैठक के नतीजों की घोषणा नौ अप्रैल को की जाएगी।

आरबीआई गवर्नर के अलावा एमपीसी में केंद्रीय बैंक के दो वरिष्ठ अधिकारी और सरकार द्वारा नियुक्त तीन लोग होते हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने फरवरी, 2023 से रेपो दर (अल्पकालिक उधार दर) को 6.5 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा था। पिछली बार आरबीआई ने कोविड के समय (मई, 2020) रेपो दर में कमी की थी और उसके बाद इसे धीरे-धीरे बढ़ाकर 6.5 प्रतिशत कर दिया गया था।

बैंक ऑफ बड़ौदा (बॉब) के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि इस सप्ताह घोषित की जाने वाली नीति ऐसे समय में आएगी जब पूरी दुनिया और अर्थव्यवस्था के भीतर कई चीजें घटित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका द्वारा लगाए गए शुल्क से वृद्धि की संभावनाओं और मुद्रा पर कुछ प्रभाव पड़ेगा, जिस पर एमपीसी को अर्थव्यवस्था की स्थिति के सामान्य आकलन से परे विचार करना होगा।

सबनवीस ने कहा, ‘‘हालांकि लगता है कि मुद्रास्फीति की संभावनाएं नरम होने और तरलता के स्थिर होने के साथ इस बार रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की कटौती हो सकती है। यह भी उम्मीद है कि केंद्रीय बैंक अपने रुख को अधिक उदार करेगा, जिसका अर्थ होगा कि इस साल के दौरान दरों में और कटौती होगी।’’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दो अप्रैल को भारत और चीन सहित लगभग 60 देशों पर 11 से लेकर 49 प्रतिशत तक का जवाबी शुल्क लगाया है, जो नौ अप्रैल से लागू होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के लिए चुनौतियां और अवसर दोनों हैं क्योंकि निर्यात में उसके कई प्रतिस्पर्धी देश जैसे चीन, वियतनाम, बांग्लादेश, कंबोडिया और थाइलैंड ऊंचे शुल्क का सामना कर रहे हैं।

रेटिंग एजेंसी इक्रा को भी उम्मीद है कि एमपीसी अपनी आगामी बैठक में तटस्थ रुख बनाए रखते हुए रेपो दर में चौथाई प्रतिशत की कटौती करेगी। इक्रा ने कहा, ‘‘हमें एमपीसी बैठक में नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में कटौती जैसी किसी बड़ी घोषणा की उम्मीद नहीं है।’’

इस बीच, उद्योग मंडल एसोचैम ने सुझाव दिया है कि एमपीसी को आगामी मौद्रिक नीति में मौजूदा स्थिति में दर में कटौती करने के बजाय ‘देखो और इंतजार करो’ का रुख अपनाना चाहिए।

एसोचैम के अध्यक्ष संजय नायर ने कहा, ‘‘आरबीआई ने हाल ही में विभिन्न उपायों के माध्यम से बाजार में तरलता बढ़ाई है। हमें इन उपायों के पूंजीगत व्यय में वृद्धि और खपत पर प्रभाव तक धैर्य रखना होगा। हमारा मानना ​​है कि आरबीआई इस नीति चक्र के दौरान रेपो दर को स्थिर रखेगा। ’’

उन्होंने कहा कि बाहरी मोर्चे पर चुनौतियों के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था के नए वित्त वर्ष में मजबूत स्थिति में रहने की उम्मीद है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 6.7 प्रतिशत की वृद्धि एक उचित उम्मीद है, जबकि खुदरा मुद्रास्फीति के नियंत्रण में रहने की संभावना है। फरवरी में खुदरा मुद्रास्फीति सात महीने के निचले स्तर 3.61 प्रतिशत पर आ गई है, जिसका मुख्य कारण सब्जियों, अंडों और अन्य प्रोटीन युक्त वस्तुओं की कीमतों में कमी है।

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रास्फीति जनवरी में 4.26 प्रतिशत और फरवरी, 2024 में 5.09 प्रतिशत थी।

सिग्नेचर ग्लोबल (इंडिया) लिमिटेड के संस्थापक और चेयरमैन प्रदीप अग्रवाल ने कहा कि केंद्रीय बैंक द्वारा खपत को बढ़ावा देने और आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए रेपो दर में चौथाई प्रतिशत की कटौती कर इसे छह प्रतिशत पर लाए जाने की उम्मीद है।

उन्होंने कहा, ‘‘नीतिगत दर में कमी कर्ज लेने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाती है, जिससे अधिक लोग घर खरीदने के लिए निवेश करने को प्रोत्साहित होते हैं, जिससे आवास बाजार में मांग बढ़ती है।’’ हालांकि, अग्रवाल ने कहा कि इस दर में कटौती का वास्तविक प्रभाव काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि वाणिज्यिक बैंक आरबीआई के नीतिगत निर्णय को ग्राहकों तक कितने प्रभावी तरीके से और तेजी से पहुंचाते हैं।

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