कोटा, 23 अक्टूबर राजस्थान के घरों में कभी लोकप्रिय रही ‘मांडना चित्रकारी’ लोक कला अब तेजी से लुप्त हो रही है। इस चित्रकारी का इस्तेमाल ग्रामीण इलाकों में मिट्टी से बनी घर की दीवारों को सजाने में किया जाता था। इसके लुप्त होते जाने का मुख्य कारण तेजी से बढ़ते शहरीकरण के साथ कंक्रीट से बने घरों का निर्माण है।
दिवाली-होली के उत्सव और जन्म-विवाह आदि से जुड़े समारोह में महिलाएं ‘मांडना चित्रकारी’ मुख्य रूप से मिट्टी की दीवार पर सफेद रंग के दूधिया तरल पदार्थ (खड़िया) से करती थीं।
इस चित्रकारी में नुकीले सितारों, छह पंखुड़ियों वाले फूलों, कमल और स्वास्तिक का इस्तेमाल किया जाता है।
बूंदी से करीब 30 किलोमीटर दूर तलवास गांव की मांडना चित्रकारी करने वालीं सीता देवी शर्मा (85) ने कहा कि लोक कला कभी दीवारों और चौखट को सजाने के लिए इस्तेमाल की जाती थी, लेकिन अब लोगों ने पक्के मकान बनवाना शुरू कर दिया है, तो यह कला लुप्त होने लगी है।
उन्होंने कहा कि अब गांव में शायद ही किसी घर में कोई मांडना चित्रकारी की जाती हो, क्योंकि लोग अब सजाने के लिए वॉलपेपर और वॉल पेंटिंग्स खरीदने लगे हैं।
बूंदी की एक अन्य मांडना कलाकार भगवती सक्सेना ने भी इस सदियों पुरानी कला के ओझल होते जाने पर अपनी निराशा जताई। उन्होंने कहा कि सौभाग्य से सुदूर ग्रामीण इलाकों में यह कला अब भी जीवित है, जहां अभी पक्के मकान नहीं बन रहे हैं।
हालांकि, कई महिला कलाकार इस कला को संरक्षित करने का भी प्रयास कर रही हैं। बारां शहर की 81 वर्षीय कौशल्या देवी शर्मा ने लकड़ी के कई बोर्ड पर 140 से अधिक मांडाना चित्रकारी की है, जिनमें से 100 को इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (आईएनटीएसीएच) ने अपने केंद्रीय पुस्तकालय में संरक्षित किया है।
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