जरुरी जानकारी | आईबीसी के कुछ प्रावधानों को स्थगित करने का मकसद व्यवहार्य कंपनियों को बचाना : साहू

मुंबई, 21 अगस्त दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के कुछ प्रावधानों को कोविड-19 की वजह से पैदा हुई स्थिति के मद्देनजर केवल निलंबित किया गया है। इसमें कंपनियों के रिण भुगतान में असफल होने की स्थिति में कर्जदाता बैंक पर प्रक्रिया शुरू करने को लेकर किसी तर का पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। भारतीय दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता बोर्ड (आईबीबीआई) के प्रमुख एम एस साहू ने शुक्रवार को यह बात कही।

साहू ने उद्योग मंडल एसोचैम द्वारा आईबीसी पर आयोजित ई-सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि कॉरपोरेट चूक के मामले में कर्जदाता बैंकों पर प्रक्रिया शुरू करने के मामले में किसी तरह का पूर्ण प्रतिबंध या रोक नहीं है।

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साहू ने कहा, ‘‘कोविड-19 संकट के मद्देनजर हमने आईबीसी में काफी सूक्ष्म ‘सर्जरी’ की है। पूर्ण स्थगन, पूर्ण प्रतिबंध या पूर्ण अंकुश जैसा कुछ नहीं है।’’

उन्होंने कहा कि हमने मध्यम मार्ग अपनाया है और कुछ चीजों को स्थगित किया है। उन्होंने कहा कि जब प्रत्येक कंपनी, उद्योग, अर्थव्यवस्था और पूरी दुनिया ही दबाव में है, तो ऐसे में परंपरागत मॉडल काम नहीं कर सकता।

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उन्होंने कहा कि हमने यह प्रयोग किया है। इसके दो विकल्प थे कि या तो संहिता के परिचालन को पूरी तरह स्थगित कर दिया जाए, तो इसे चलने दिया जाए।

साहू ने स्पष्ट करते हुए कहा, ‘‘यदि आप संहिता का परिचालन स्थगित कर देते तो आप अव्यवहार्य कंपनी का परिसमापन नहीं कर सकते थे। इस गलती को अगली तिमाही या अगले साल सुधारा जा सकता है, लेकिन दूसरा विकल्प कि आप आईबीसी को उसके सामान्य तरीके से काम करने देते रहते, तो इस गलती को कभी सुधारा नहीं जा सकता था।’’

उन्होंने कहा कि ऐसे में हमारे लिए व्यवहार्य कंपनी को बचाना अव्यवहार्य कंपनी के परिसमापन से अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि दोनों ही विकल्पों के वांछित और अवांछित दोनों प्रकार के नतीजे होंगे।

उन्होंने कहा कि जो कंपनियां पहले दबाव में नहीं थीं, लेकिन कोविड-19 की वजह से दबाव में आ गई हैं, उन्हें इस स्थिति में दिवाला कार्रवाई के तहत जाने से बचाना होगा।

आईबीबीआई के प्रमुख ने कहा, ‘‘इस बात की संभावना है कि कोई कंपनी जिसने पहले कभी चूक नहीं की है, कोविड-19 के दौरान कुछ बुनियादी कारणों से चूक करती है, इस तरह के विरले मामले हो सकते हैं। लेकिन यदि हम इसमें जाएंगे तो कई साल कानूनी लड़ाई लड़ने में गंवा देंगे। ऐसे में इस तरह के विरले मामलों में संदेह का लाभ देते हुए आगे बढ़ना चाहिए।’’

अजय

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