जरुरी जानकारी | पंजाब को उम्मीद, पांच लाख हेक्टेयर में धान की सीधी बुवाई होगी

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. कोरोनो वायरस संकट के बीच प्रवासी कामगारों के पलायन के कारण फसल रोपाई की लागत दोगुनी होने से पंजाब को सीधे धान छिड़काव की उत्पादन विधि के साथ खेती के रकबे में करीब 10 गुना वृद्धि होने की उम्मीद है। धान की सीधी बुवाई कम श्रम लागत वाला विकल्प है।

चंडीगढ़, दो जून कोरोनो वायरस संकट के बीच प्रवासी कामगारों के पलायन के कारण फसल रोपाई की लागत दोगुनी होने से पंजाब को सीधे धान छिड़काव की उत्पादन विधि के साथ खेती के रकबे में करीब 10 गुना वृद्धि होने की उम्मीद है। धान की सीधी बुवाई कम श्रम लागत वाला विकल्प है।

अधिकारियों ने यहां बताया कि पंजाब ने इस साल धान के कुल 27 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में से लगभग पांच लाख हेक्टेयर को धान की सीधी बुवाई (डीएसआर) के दायरे में लाने का प्रस्ताव किया है।

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उन्होंने कहा कि पिछले साल, कुल धान क्षेत्र का लगभग 50,000 हेक्टेयर क्षेत्र डीएसआर के तहत लाया गया था।

राज्य सरकार धान उत्पादकों को धान रोपाई की पारंपरिक विधि के बजाय डीएसआर पद्धति (सीधी बुवाई) को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

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कृषि विशेषज्ञों ने कहा कि डीएसआर पद्धति न केवल पानी की बचत करती है, बल्कि श्रमिकों की कमी का भी समाधान है जो इस समय प्रवासी श्रमिकों के अपने मूल स्थानों पर लौटने के कारण महसूस की जा रही है।

पंजाब के कृषि सचिव के एस पन्नू ने कहा, ‘‘राज्य सरकार ने डीएसआर प्रणाली के तहत पांच लाख हेक्टेयर खेत लाने का प्रस्ताव किया है, जिसमें बड़ी संख्या में मजदूरों की आवश्यकता नहीं है।’’

डीएसआर पद्धति के तहत, धान के बीज को 'लकी सीड ड्रिल' मशीन की मदद से खेत में जमीन के अंदर डाल दिया जाता है और साथ साथ खर पतवार नाशक का छिड़काव किया जाता है। यदि यह उपलब्ध नहीं है, तो चावल को झुके हुए प्लेट मीटरिंग तंत्र वाले सीड ड्रिल के साथ खेत की जमीन में डाला जा सकता है और बुवाई के तुरंत बाद हर्बिसाइड का छिड़काव किया जाना चाहिए।

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के एम एस भुल्लर ने कहा कि चावल की नर्सरी बढ़ाने और फिर एक खेत में चावल की रोपाई करने की पारंपरिक पद्धति की तुलना में सीधी रोपाई की पद्धति, सिंचाई के पानी, श्रम और ऊर्जा की बचत करता है।

भुल्लर ने कहा, ‘‘यह यंत्रीकृत चावल की खेती की तरह है, जैसा कि हम गेहूं के मामले में करते हैं।’’

पारंपरिक पद्धति के अनुसार, पहले नर्सरी में किसानों द्वारा धान के पौधे उगाये जाते हैं और फिर उन्हें उखाड़कर खेत में रोपा जाता है। इसके अलावा, फसल की रोपाई के लिए प्रति एकड़ कम से कम तीन से चार मजदूरों की आवश्यकता होती है।

मजदूरों की कमी होने के कारण, धान की रोपाई के लिए मजदूरी पिछले साल की तुलना में दोगुना बढ़कर 5,000-6,000 रुपये प्रति एकड़ हो गयी है।

कोरोना वायरस संकट के बीच, पंजाब में कई प्रवासी श्रमिक उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड स्थितअपने घरों को लौट गए हैं।

भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा, ‘‘पिछले साल धान रोपाई के लिए मजदूरी 2,500-3,000 रुपये प्रति एकड़ थी और इस साल मजदूरी दर 5,000 रुपये से 6,000 रुपये प्रति एकड़ तक बढ़ गयी है।’’

उन्होंने कहा कि किसान डीएसआर पद्धति को बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं।

इस बीच, राज्य के कृषि विभाग ने खरीफ मौसम में 27 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को धान खेती के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा है। पिछले साल धान का रकबा 29.30 लाख हेक्टेयर था।

अधिकारियों ने कहा कि विभाग को धान रकबे का लगभग 2.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र अन्य फसलों के उत्पादन के लिए उपयोग या स्थानांतरित किये जाने का भी अनुमान है।

राज्य में धान की रोपाई 10 जून से शुरू होगी।

एक अधिकारी ने कहा, ‘‘हालांकि कोविड-19 के कारण गहन खेती के कामकाज के लिए यह चुनौतीपूर्ण समय है, लेकिन किसानों की सक्रिय भागीदारी के साथ पंजाब निर्धारित समय के भीतर धान की रोपाई कर सकेगा।’’

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