निजी नियोक्ता नौकरी संबंधी विवादों के समाधान के लिए अदालत निर्दिष्ट कर सकते हैं: उच्चतम न्यायालय

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि निजी नियोक्ता नियुक्ति पत्रों में यह निर्दिष्ट करने वाला एक खंड शामिल कर सकते हैं कि किसी भी रोजगार-संबंधी विवाद का समाधान एक विशेष न्यायालय या क्षेत्राधिकार में निकाला जाएगा. न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि अनुबंध कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है, चाहे इसमें शामिल पक्ष कोई भी हो.

सुप्रीम कोर्ट (Photo: Wikimedia Commons)

नयी दिल्ली, 9 अप्रैल : उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि निजी नियोक्ता नियुक्ति पत्रों में यह निर्दिष्ट करने वाला एक खंड शामिल कर सकते हैं कि किसी भी रोजगार-संबंधी विवाद का समाधान एक विशेष न्यायालय या क्षेत्राधिकार में निकाला जाएगा. न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि अनुबंध कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है, चाहे इसमें शामिल पक्ष कोई भी हो. उसने कहा, ‘‘अनुबंध के माध्यम से किसी भी पक्ष से कानूनी निर्णय का अधिकार नहीं छीना जा सकता है, लेकिन पक्षों की सुविधा के लिए कुछ न्यायालयों को हस्तांतरित किया जा सकता है.’’ न्यायालय ने कहा कि इस विवाद में, खंड ने कर्मचारियों के कानूनी दावे को आगे बढ़ाने के अधिकार को नहीं छीना, बल्कि उन्हें केवल मुंबई की अदालतों के समक्ष दावों को आगे बढ़ाने तक सीमित कर दिया. सर्वोच्च न्यायालय पटना में नियुक्त एचडीएफसी बैंक और दिल्ली में लॉर्ड कृष्णा बैंक के दो कर्मचारियों द्वारा दायर अपीलों पर सुनवाई कर रहा था. दोनों मामलों में बैंकों ने अपने नियुक्ति पत्रों में उल्लेख किया था कि पक्षों के बीच किसी भी विवाद को मुंबई की एक सक्षम अदालत के समक्ष हल किया जाना चाहिए.

जब धोखाधड़ी और कदाचार के आरोपों के कारण दोनों कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं, तो उन्होंने पटना और दिल्ली में संबंधित अदालतों में अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी. इन स्थानों पर उच्च न्यायालयों ने माना कि कर्मचारी अपनी बर्खास्तगी को उस अदालत में चुनौती दे सकते हैं, जहां वे सेवा समाप्ति से पहले कार्यरत थे. हालांकि, शीर्ष अदालत ने बताया कि सार्वजनिक सेवा और निजी नियोक्ता के साथ सेवा अनुबंध के बीच बहुत अंतर है.

उसने कहा, ‘‘सरकारी सेवा की उत्पत्ति संविदात्मक है. हर मामले में प्रस्ताव और स्वीकृति होती है. लेकिन एक बार अपने पद या कार्यालय में नियुक्त होने के बाद, सरकारी कर्मचारी एक दर्जा प्राप्त कर लेता है और उसके अधिकार और दायित्व अब दोनों पक्षों की सहमति से नहीं, बल्कि बनाए गए कानून या वैधानिक नियमों द्वारा निर्धारित होते हैं.’’ यह भी पढ़ें : कामरा के वीडियो को फिर से साझा करने के मामले में किसी के खिलाफ बदले की कार्रवाई नहीं: उच्च न्यायालय

पीठ ने यह भी कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी की कानूनी स्थिति अनुबंध से अधिक उसके स्तर की होती है. इसमें कहा गया है, "यदि कोई विवाद उत्पन्न होता है तो किसी सरकारी कर्मचारी को उसके नियोक्ता द्वारा किसी विशेष स्थान की अदालत में ही जाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है तथा किसी अदालत के क्षेत्राधिकार का सवाल आने पर अनुच्छेद 14, 16 और 21 इसमें बाधा बन सकते हैं." दूसरी ओर, पीठ ने कहा कि निजी क्षेत्र में सेवा, दोनों पक्षों के बीच हुए रोजगार अनुबंध की शर्तों द्वारा शासित होती है.

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