देश की खबरें | प्रधानमंत्री डिग्री विवाद: ‘सार्वजनिक रुचि’ और ‘सार्वजनिक हित’ में कोई समानता नहीं- डीयू

नयी दिल्ली, 11 फरवरी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की डिग्री को सार्वजनिक करने की मांग के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) ने मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायालय में दलील दी कि ‘‘सार्वजनिक रुचि’’ वाली कोई चीज ‘‘सार्वजनिक हित’’ के समान नहीं है, जिससे कि आरटीआई के तहत इसका खुलासा करना जरूरी हो।

डीयू का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 21 दिसंबर, 2016 के केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के एक आदेश के संबंध में न्यायमूर्ति सचिन दत्ता के समक्ष दलील दी। सीआईसी के इस आदेश में 1978 में बीए परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले सभी छात्रों के रिकॉर्ड के निरीक्षण की अनुमति दी गई थी। इसी वर्ष प्रधानमंत्री मोदी ने भी यह परीक्षा उत्तीर्ण की थी।

उच्च न्यायालय ने 23 जनवरी, 2017 को सीआईसी के आदेश पर रोक लगा दी थी।

मेहता ने कहा, ‘‘महज जिज्ञासा कि ‘मैं इसके बारे में जानना चाहता हूं कि आपकी आपत्ति क्या है’, यह कोई तर्क नहीं हो सकता। जनता को किसी चीज में दिलचस्पी हो सकती है लेकिन यह सार्वजनिक हित नहीं हो सकता है..क्या इस मामले में कोई सार्वजनिक हित है? इस मामले के तथ्यों में उत्तर नहीं है।’’

सीआईसी के फैसले को चुनौती देने वाली अपनी याचिका में डीयू ने इसे ‘‘मनमाना’’ और ‘‘कानून की दृष्टि से नहीं टिकने लायक’’ बताया और कहा कि जिस जानकारी का खुलासा करने की मांग की गई है वह ‘‘तीसरे पक्ष की व्यक्तिगत जानकारी’’ है।

आरटीआई आवेदक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने आदेश का बचाव किया और कहा कि एक छात्र द्वारा प्राप्त अंक किसी शिक्षा संस्थान द्वारा विश्वासपूर्ण क्षमता में नहीं रखे जाते।

हेगड़े ने तर्क दिया कि आरटीआई अधिनियम में व्यापक जनहित में ऐसी जानकारी का खुलासा करने का प्रावधान है।

डीयू के वकील ने कहा कि शैक्षिक योग्यता निजी है और इसकी अनुचित मांग नहीं की जा सकती तथा निजी मामले में जनता का हित निजता के खिलाफ है।

मामले में अगली सुनवाई 19 फरवरी को होगी।

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