देश की खबरें | कर्नाटक सरकार पर जाति आधारित गणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करने का दबाव बढ़ा

बेंगलुरु, तीन अक्टूबर बिहार सरकार के जाति आधारित गणना की रिपोर्ट सार्वजनिक किए जाने के बाद कर्नाटक सरकार पर भी राज्य की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक जनगणना को सार्वजनिक करने का दबाव बढ़ रहा है।

इस जनगणना को ‘जाति आधारित गणना’ भी कहा जा रहा है।

वर्ष 2015 में सिद्धरमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 170 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से राज्य में सामाजिक और शैक्षिक सर्वेक्षण शुरू किया था, जिसके नतीजे अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

राज्य के पिछड़ा वर्ग आयोग को जाति गणना कराने का काम सौंपा गया था। उस वक्त आयोग के अध्यक्ष एच कंथाराज थे और उनकी अगुवाई में यह काम किया गया था।

कुछ विश्लेषकों के अनुसार सरकारें सर्वेक्षण के नतीजों को जारी करने से कतरा रही है क्योंकि सर्वेक्षण के नतीजे कर्नाटक में विभिन्न जातियों की संख्या को लेकर ‘‘पारंपरिक धारणा’’ के कथित रूप से विपरीत हैं।

राज्य के राजनीतिक दल सर्वेक्षण को स्वीकार नहीं करने और इसे सार्वजनिक नहीं करने को लेकर लंबे समय से एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता बी के हरिप्रसाद ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद की सराहना करते हुए कर्नाटक में अपनी पार्टी की सरकार से जाति जनगणना के आंकड़े जल्द से जल्द जारी करने का आग्रह किया।

हरिप्रसाद ने कहा,‘‘ जाति गणना की मांग लंबे समय से की जा रही है। क्योंकि इससे विभिन्न समुदायों को वे अधिकार देने में मदद मिलेगी जिसके वे हकदार हैं। हमारे शीर्ष नेता राहुल गांधी की लंबे समय से यह इच्छा रही है कि राज्य और देश दोनों में जाति आधारित गणना हो और उसके आधार पर जनसंख्या कार्यक्रम तैयार किया जाए। इसके लिए कंथाराज आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए।’’

उन्होंने नयी दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अगर उस रिपोर्ट में कोई कमी है तो उसे सुधार कर उसे लागू करने की जरूरत है।

कर्नाटक राज्य स्थायी पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष के. जयप्रकाश हेगड़े ने आज कहा कि रिपोर्ट अगले महीने तक सरकार को सौंपे जाने की संभावना है।

मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने कहा कि एक बार कर्नाटक राज्य स्थायी पिछड़ा वर्ग आयोग रिपोर्ट सौंप दे तो उनकी सरकार इस पर कोई निर्णय करेगी।

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