देश की खबरें | ‘शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत’ को कमजोर नहीं करती न्यायिक समीक्षा की शक्ति: उच्चतम न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को केंद्र सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि न्यायालय को नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की पड़ताल करने से बचना चाहिए। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति ‘‘शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत’’ को कमजोर नहीं करती।

नयी दिल्ली, 17 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को केंद्र सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि न्यायालय को नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की पड़ताल करने से बचना चाहिए। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति ‘‘शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत’’ को कमजोर नहीं करती।

न्यायालय ने यह टिप्पणी नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए की, जो 1 जनवरी 1966 को या उसके बाद लेकिन 25 मार्च 1971 से पहले असम में प्रवेश करने वाले बांग्लादेशी प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करती है।

प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ में शामिल, न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने अपनी तथा न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की ओर से निर्णय लिखते हुए कहा कि न्यायिक समीक्षा, राज्य (सरकार) के किसी भी अंग द्वारा संवैधानिक उल्लंघन को रोकने के लिए पड़ताल और संतुलन की प्रणाली सुनिश्चित कर शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा को बढ़ावा देती है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने 184 पृष्ठों के एक अलग फैसले में लिखा, ‘‘न्यायिक समीक्षा की शक्ति शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को कमजोर नहीं करती... शक्तियों के पृथक्करण को एक सीमा या बाधा के बजाय एक संबंध या संपर्क के रूप में देखा जाना चाहिए; ताकि न्यायालय को यह सुनिश्चित करने का अवसर मिले कि संवैधानिक व्यवस्था कायम रहे।’’

न्यायाधीशों ने केंद्र की इस दलील को खारिज कर दिया कि इस मामले में नीतिगत विचार-विमर्श किये जाने की जरूरत है और इसलिए इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने लिखा, ‘‘इसलिए, यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि न्यायालयों के पास यह पड़ताल करने का अधिकार है कि विधायी या शासकीय कार्रवाई संविधान का उल्लंघन करती है या नहीं... यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के अनुरूप है, जो न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका की कार्रवाइयों के खिलाफ संरक्षक के रूप में कार्य करने का अधिकार देता है, और आवश्यक होने पर नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए (न्यायालय) हस्तक्षेप करता है।’’

निर्णय में कहा गया है कि हालांकि, न्यायालयों को संविधान और अन्य कानूनी प्रावधानों से संबंधित दूसरी चीजों पर नियंत्रण और संतुलन बनाए रखने का अधिकार दिया गया है, लेकिन उन्हें नीतिगत निर्णयों के अतिरिक्त पहलुओं पर विचार करने और उसके स्थान पर नागरिकों पर शासन कर विधायिका का स्थान लेने का अधिकार नहीं दिया गया है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘चूंकि अदालतों को ऐसे तथ्यात्मक पहलुओं का मूल्यांकन करने की शक्तियों से लैस नहीं किया गया है, इसलिए उन्हें नीति बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।’’ शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि नीतिगत मामलों को विधायिका को सौंपा जाना चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की संविधान पीठ ने ये निर्णय सुनाए।

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