देश की खबरें | भाजपा नेताओं के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषण के लिए प्राथमिकी के अनुरोध वाली याचिका खारिज

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने सीएए विरोधी प्रदर्शन को लेकर कथित नफरती भाषण के लिए केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद प्रवेश वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के संबंध में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की नेता वृंदा करात और के एम तिवारी की याचिका सोमवार को खारिज कर दी। याचिकाकर्ताओं ने मामला दर्ज करने के लिए निर्देश देने से इनकार करने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी।

नयी दिल्ली, 13 जून दिल्ली उच्च न्यायालय ने सीएए विरोधी प्रदर्शन को लेकर कथित नफरती भाषण के लिए केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद प्रवेश वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के संबंध में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की नेता वृंदा करात और के एम तिवारी की याचिका सोमवार को खारिज कर दी। याचिकाकर्ताओं ने मामला दर्ज करने के लिए निर्देश देने से इनकार करने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी।

न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह ने 25 मार्च को फैसला सुरक्षित रख लिया था। उन्होंने निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और कहा कि कानून के तहत, वर्तमान तथ्यों के हिसाब से प्राथमिकी दर्ज करने के लिए सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक मंजूरी प्राप्त करने की आवश्यकता है।

न्यायाधीश ने कहा कि निचली अदालत ने याचिकाकर्ताओं की याचिका पर सही फैसला किया और कानून के तहत वैकल्पिक उपाय की मौजूदगी को देखते हुए उच्च न्यायालय के रिट अधिकार क्षेत्र के प्रयोग का कोई मामला नहीं बनता है।

न्यायाधीश ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने मामले में प्रारंभिक जांच की थी और निचली अदालत को सूचित किया था कि प्रथम दृष्टया कोई संज्ञेय अपराध का मामला नहीं बनता है तथा किसी भी जांच का आदेश देने के लिए निचली अदालत को इसके समक्ष उन तथ्यों और साक्ष्यों का संज्ञान लेने की आवश्यकता है, जो बिना वैध मंजूरी के मान्य नहीं है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि निचली अदालत ने मंजूरी के अभाव में इस पर विचार किया जाए या नहीं इस बिंदु पर याचिकाकर्ताओं की याचिका पर उचित फैसला किया।

याचिकाकर्ताओं ने निचली अदालत के समक्ष अपनी शिकायत में दावा किया था कि ठाकुर और वर्मा ने लोगों को भड़काने की कोशिश की थी, जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली में दो अलग-अलग विरोध स्थलों पर गोलीबारी की तीन घटनाएं हुईं।

याचिकाकर्ताओं की शिकायत थी कि यहां रिठाला रैली में ठाकुर ने 27 जनवरी, 2020 को भीड़ को उकसाने के लिए भड़काऊ नारेबाजी की थी। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि वर्मा ने 28 जनवरी, 2020 को शाहीन बाग में सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित रूप से भड़काऊ टिप्पणी की थी।

निचली अदालत ने 26 अगस्त, 2021 को याचिकाकर्ताओं की प्राथमिकी दर्ज करने की याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि यह टिकने योग्य नहीं है क्योंकि सक्षम प्राधिकार, केंद्र सरकार से अपेक्षित मंजूरी नहीं मिली।

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘निचली अदालत ऐसे किसी मामले में प्राथमिकी दर्ज करने या जांच का निर्देश नहीं दे सकती है जहां सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत शक्ति का प्रयोग करते हुए अपराध का संज्ञान लेने से पहले मंजूरी की आवश्यकता होती है।’’

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘एक बार जब जांच एजेंसी अपनी प्रारंभिक जांच करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि प्रथम दृष्टया कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है, तो एसीएमएम (अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट) को जांच का निर्देश देने या प्राथमिकी दर्ज करने के लिए अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।’’

उच्च न्यायालय ने 66-पृष्ठ के आदेश में कहा, ‘‘हालांकि, जैसा कि पहले चर्चा की गई थी, किसी भी जांच का आदेश देने के उद्देश्य से एसीएमएम को तत्काल मामले में अपने सामने तथ्यों, सबूतों का संज्ञान लेना होगा, जो वैध मंजूरी के बिना स्वीकार्य नहीं है।’’

पीठ ने कहा कि ‘‘नियमित तरीके से’’ नफरत फैलाने वाले भाषणों समेत कुछ अपराधों की जांच का आदेश देने से बचने के लिए ‘‘विवेकाधीन होने के बावजूद जांच की एक अतिरिक्त परत’’ मंजूरी के माध्यम से संहिता की धारा 196 (3) के तहत प्रदान की गई है।

पीठ ने कहा कि अगर धारा 295 ए, 153 ए और धारा 505 के तहत नियमित आधार पर जांच के आदेश दिए जाएं तो ऐसी स्थिति होगी जहां देश में हजारों प्राथमिकियां राजनीतिक हित साधने के लिए दर्ज कराई जाएंगी। यह ना केवल प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा बल्कि आपराधिक न्याय प्रणाली का बोझ और बढ़ेगा।

याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय के समक्ष निचली अदालत के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी थी कि मामले में दोनों नेताओं के खिलाफ एक संज्ञेय अपराध का मामला बनता है और उनके खिलाफ यहां शाहीन बाग में संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) विरोधी प्रदर्शन के संबंध में कथित नफरती भाषणों के लिए प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे पुलिस से सिर्फ मामले की जांच करने को कह रहे थे।

दिल्ली पुलिस ने निचली अदालत के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि अदालत ने सही कहा कि मामले से निपटने के लिए उसके पास अधिकार क्षेत्र नहीं है और उसने उच्चतम न्यायालय के फैसलों का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि अगर कोई न्यायाधीश कह रहा है कि उसके पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, तो उसे मामले के तथ्यों पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए तथा यह सही दृष्टिकोण है।

शिकायत में, करात और तिवारी ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153-ए (धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 153-बी (राष्ट्रीय एकजुटता को कमजोर करने वाले भाषण देना) और 295-ए (जानबूझकर किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना) के तहत प्राथमिकियां दर्ज किए जाने का अनुरोध किया था।

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