कोलकाता, 26 अप्रैल पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए पश्चिम बंगाल के तीन पर्यटकों और उधमपुर में शहीद हुए एक सैनिक के ताबूत कश्मीर से लाए जाने के बाद प्रदेश में न केवल शोक की लहर है, बल्कि इसने धर्म, राजनीति और भावनाओं को एक साथ उद्वेलित कर दिया तथा ध्रुवीकरण बढ़ाया है और इस तरह यह राज्य की अस्मिता की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाता है।
राज्य विधानसभा चुनाव (2026) के लिए साल भर से भी कम समय बचे होने के बीच, इन घटनाओं ने सियासी पारा चढ़ा दिया और इसके भावनात्मक रूप लेने की संभावना है, जिसके इर्द-गिर्द चुनावी रणनीतियां देखने को मिल सकती हैं।
कश्मीर में मंगलवार को बंगाल के पर्यटकों--बितान अधिकारी, समीर गुहा और मनीष रंजन मिश्रा से कथित तौर पर उनका धर्म पूछे जाने के बाद आतंकियों ने नृशंस तरीके से उनकी हत्या कर दी।
इन हत्याओं के भयावह स्वरूप ने धर्म को राजनीति के केंद्र में ला दिया है। वहीं, राजनीतिक दल धर्म, राष्ट्रवाद और पीड़ित होने के माध्यम से कहानी गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। ये मौतें बंगाल के राजनीतिक अखाड़े में एक नये रण क्षेत्र में तब्दील हो गई हैं।
चौथा ताबूत उधमपुर में एक अलग हमले में जान गंवाने वाले नादिया के सैनिक झोंटू अली शेख का है। इसने भावनात्मक और राजनीतिक विमर्श को और अधिक जटिल बना दिया है, क्योंकि शहादत और आतंकवाद को अब साम्प्रदायिक चश्मे से देखा जाने लगा है।
हमलों के बाद धार्मिक अस्मिता के आह्वान ने बंगाल की राजनीति में बदलाव का संकेत दिया है - जिसके बारे में विश्लेषकों का कहना है कि यह भाजपा के ‘‘विचारधारा को आगे बढ़ाने’’ और तृणमूल कांग्रेस की ‘‘तुष्टिकरण की राजनीति’’ के साथ जुड़ा हुआ है।
‘सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज’ के राजनीति विज्ञानी मैदुल इस्लाम ने पीटीआई- को बताया, ‘‘यह सिर्फ आतंक और त्रासदी की कहानी नहीं है। यह मृतकों की धार्मिक पहचान के बारे में है। हम अब पहचान और राजनीतिक दांव-पेंच से आकार लेते परस्पर विरोधी विमर्श देख रहे हैं।’’
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