पुलवामा, छह सितंबर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने बुधवार को कहा कि विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ अपना नाम बदलने के लिए तैयार है, यदि इसके चलते केंद्र सरकार ‘इंडिया’ की जगह नाम भारत करने की कथित तौर पर योजना बना रही है।
अब्दुल्ला की यह टिप्पणी जी-20 से संबंधित रात्रिभोज के निमंत्रण पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ‘प्रेसीडेंट ऑफ भारत’ (भारत के राष्ट्रपति)’ के तौर पर संदर्भित किए जाने के बाद आई, उनके पद का पारंपरिक रूप से 'प्रेसीडेंट आफ इंडिया’ के तौर पर उल्लेख किया जाता रहा है। इसको लेकर मंगलवार को विपक्ष ने नरेन्द्र मोदी सरकार पर यह आरोप लगाते हुए निशाना साधा कि वह देश के नाम के तौर पर ‘इंडिया’ हटाकर केवल भारत करने की योजना बना रही है।
अब्दुल्ला ने श्रीनगर से लगभग 35 किलोमीटर दूर यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘यदि इसके पीछे का कारण यह है कि विपक्षी गठबंधन ने अपना नाम ‘इंडिया’ रखा है, तो हम अपना (विपक्षी गठबंधन का) नाम बदल देंगे। हम देश को संकट में नहीं डालना चाहते। हम देश का खर्च बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि उसे कम करने के लिए आए हैं। यदि हमें इसका थोड़ा सा भी संकेत मिल जाए कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि (विपक्षी) गठबंधन का नाम ‘इंडिया’ है, तो हम अपना नाम बदल देंगे।’’
उन्होंने कहा कि संविधान में देश के नाम के रूप में ‘इंडिया’ और भारत दोनों का उल्लेख किया गया है, लेकिन ‘इंडिया’ को कानून से नहीं हटाया जाना चाहिए।
जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘यह हमारे संविधान में लिखा है। दोनों नाम हैं, हम दोनों नाम इस्तेमाल करते हैं। यदि आप प्रधानमंत्री के विमान को देखें जिसमें वह आज इंडोनेशिया जा रहे हैं, तो उस पर दोनों नाम हैं - ‘इंडिया’ भी और ‘भारत’ भी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘अगर प्रधानमंत्री किसी कारण से ‘इंडिया’ नाम का इस्तेमाल नहीं करना चाहते हैं, तो न करें। लेकिन इसे (इंडिया) संविधान से नहीं हटाया जाना चाहिए और इसे हमारे चयन पर छोड़ दिया जाना चाहिए।’’
अब्दुल्ला ने ‘इंडिया’ की जगह भारत को तरजीह दिए जाने के पीछे के तर्क पर भी सवाल उठाया।
उन्होंने सवाल किया, ‘‘यदि आप इसे (इंडिया) हटाने का निर्णय लेते हैं, तो आप इसे कहां से हटाएंगे? क्या स्टेट बैंक आफ इंडिया का नाम बदल जाएगा? क्या हाल ही में चंद्रयान-3 मिशन को सफलतापूर्वक पूरा करने वाले ‘इसरो’ का नाम बदल जाएगा? आईआईटी, आईआईएम और कितने संस्थानों के नाम बदलेंगे?’’
इस महीने के अंत में आहूत संसद के विशेष सत्र के बारे में पूछे जाने पर अब्दुल्ला ने कहा, ‘‘संसद के विशेष सत्र के लिए कोई एजेंडा नहीं है। अगर कोई एजेंडा होता तो हम इस पर बात करते।’’
उन्होंने कहा, ‘‘जहां तक 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की बात है तो पहले भी कम से कम चार या पांच बार समितियां बन चुकी हैं। अब यह नयी समिति है, इसका उद्देश्य क्या है, हम नहीं जानते।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यदि उद्देश्य प्रक्रिया को सरल बनाना है तो इससे किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर आप 'एक देश, एक चुनाव' के जरिए क्षेत्रीय पार्टियों को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं तो हम इसके सख्त खिलाफ हैं। अगर उद्देश्य देश के संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचाना है तो हम इसके भी खिलाफ हैं। अगर उद्देश्य एक राष्ट्र, कोई चुनाव नहीं है तो कोई भी इसका समर्थन नहीं करेगा।’’
आर्थिक विकास और राजनीतिक स्थिरता पर प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अब्दुल्ला ने कहा कि विकास का लाभ जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है।
उन्होंने कहा, ''विकास पहले भी रहा है और इससे कहीं अधिक। आज, अधिक विकास की गुंजाइश है लेकिन हमें ज़मीन पर विकास का पर्याप्त प्रभाव नहीं दिख रहा है। देश में बेरोजगारी, महंगाई और कृषि संकट बढ़ रहा है। आप विकास के आंकड़े दे सकते हैं लेकिन युवाओं को इसका जो लाभ मिलना चाहिए वह नहीं है।’’
इस बीच, पीडीपी प्रवक्ता मोहित भान ने कहा कि ‘इंडिया’ का नाम बदलकर भारत करने का विवाद ध्यान भटकाने वाली रणनीति है।
भान ने श्रीनगर में कहा, ‘‘चाहे आप इसे इंडिया कहें या भारत, गरीबी वही है, महंगाई वही है, भ्रष्टाचार अभी भी है। दोनों में कोई अंतर नहीं है। देश जिस स्थिति से गुजर रहा है - चाहे वह बेरोजगारी हो, भ्रष्टाचार हो, महंगाई हो या मणिपुर और नूंह (हरियाणा) में नफरत का माहौल हो - वह देश को भारत कहने से नहीं बदलेगा।’’
भान ने कहा, ‘‘जो बुनियादी मुद्दे जी20 प्रतिनिधियों का ध्यान खींच सकते थे, उन्हें सरकार ने चालाकी से दरकिनार कर दिया है। लोगों से हमारी अपील है कि उन्हें बुनियादी मुद्दों पर सवाल उठाना चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि जहां तक संवैधानिक वैधता का सवाल है, ‘‘हमने देखा है कि संविधान सभा ने काफी विचार-विमर्श और चर्चा के बाद इस नाम को पारित किया।’’
भान ने कहा कि 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' भी "सिर्फ एक नारा है क्योंकि अभी तक इसका कोई मसौदा नहीं है।"
उन्होंने कहा, "यह उन मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास है जिन पर सरकार पिछले नौ वर्षों में विफल रही है।"
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