तिरुवनंतपुरम, 18 जुलाई केरल की राजनीति में खासा दखल रखने वाले वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी का छह दशक लंबा राजनीतिक सफर राज्य के द्विध्रुवीय राजनीतिक तंत्र में कांग्रेस पार्टी के उतार-चढ़ाव का गवाह रहा।
केरल विधानसभा के सबसे लंबे समय तक विधायक रहे पूर्व मुख्यमंत्री चांडी का बेंगलुरु में निधन हो गया। यह खबर ऐसे समय में आई, जब उनकी पार्टी के सभी शीर्ष नेता विपक्षी एकता के लिए शहर में एकत्र हुए हैं।
हमेशा सफेद सूती शर्ट और धोती में सौहार्दपूर्ण मुस्कान के साथ दिखाई देने वाले चांडी ने मंगलवार तड़के बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह 79 वर्ष के थे। चांडी का पिछले कुछ महीनों से बेंगलुरु में इलाज चल रहा था।
कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठन ‘केरल स्टूडेंट्स यूनियन’ (केएसयू) का हाथ थामकर छात्र राजनीति में कदम रखने वाले चांडी राज्य की राजनीति के एक मंझे हुए खिलाड़ी बने रहे।
चांडी ने वरिष्ठ सहयोगियों ए.के. एंटनी और वायलार रवि के साथ मिलकर केरल में कांग्रेस को एक जन आंदोलन के रूप में खड़ा करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी।
कोट्टायम के पास पारंपरिक ईसाई बहुल पुथुपल्ली में जन्मे और पले-बढ़े चांडी ने एंटनी और रवि के साथ काम करते हुए केएसयू के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली और उनकी लोकप्रियता में इजाफा हुआ।
केरल में 1960 के दशक की शुरुआत से कांग्रेस के युवा नेतृत्व की कड़ी मेहनत ने राज्य में मार्क्सवादियों के राजनीतिक प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए एक शक्ति के रूप में पार्टी के उभरने में बहुत योगदान दिया।
चांडी जैसे युवा नेता पारंपरिक नेतृत्व के प्रभुत्व वाली कांग्रेस में अंततः एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र के रूप में उभरे। इससे गुटबाजी भी देखने को मिली, जहां कांग्रेस में दूसरे खेमे का नेतृत्व पार्टी के दिवंगत नेता के. करुणाकरण ने किया था।
कांग्रेस की राज्य इकाई में गहरी अंदरूनी कलह के दौरान, चांडी को एंटनी के भरोसेमंद सहयोगी के रूप में देखा जाता था, जो राज्य में करुणाकरण विरोधी गुट के निर्विवाद नेता थे।
वर्ष 1995 में करुणाकरण को मुख्यमंत्री पद से हटाने में चांडी की महत्वपूर्ण भूमिका थी, जिसने एंटनी की दूसरी बार इस पद पर वापसी का मार्ग प्रशस्त किया।
चांडी उस गुट का हिस्सा थे, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) से अलग हो गया था। इस गुट ने आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार के दौरान चिकमगलुरु उपचुनाव के लिए पार्टी उम्मीदवार के रूप में इंदिरा गांधी के नामांकन पर आपत्ति जताई थी।
हालांकि, चांडी और एंटनी 1980 के दशक की शुरुआत में माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ में कुछ समय रहने के बाद कांग्रेस में लौट आए।
कांग्रेस में वापसी के बाद चांडी को राज्य में पार्टी में करुणाकरण विरोधी गुट के खिलाफ एक तेजतर्रार रणनीतिकार के रूप में अपनी प्रमुख भूमिका को फिर से स्थापित करने में ज्यादा समय नहीं लगा।
पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच अपनी लोकप्रियता के बावजूद, चांडी की कभी भी कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का हिस्सा बनने की कोई इच्छा नहीं थी।
चांडी माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ गठबंधन का खासकर मध्य त्रावणकोर में मुकाबला करने में सबसे आगे थे।
वर्ष 2011 में जब चांडी मुख्यमंत्री बने, तो कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के पास बहुमत को लेकर शंका थी।
हालांकि, असाधारण परिस्थितियों से निपटने की क्षमताओं वाले एक चतुर राजनेता, चांडी ने यूडीएफ के सभी घटकों के साथ काम किया और उनकी सरकार ने कार्यकाल पूरा किया।
वह पहली बार 1970 में कांग्रेस के टिकट पर पुथुपल्ली से चुने गए थे।
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