प्रयागराज, 18 नवंबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर केंद्र, राज्य सरकार, मथुरा के जेल अधीक्षक और मांत थाना के उप निरीक्षक को बुधवार को नोटिस जारी किया।
न्यायमूर्ति प्रितिंकर दिवाकर और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की पीठ ने केंद्र, राज्य सरकार, मथुरा के जेल अधीक्षक और मांत थाना के उप निरीक्षक प्रबल प्रताप सिंह को नोटिस जारी किए।
यह याचिका विद्यार्थी अतीक उर्रहमान, कैब ड्राइवर आलम और सामाजिक कार्यकर्ता मसूद की ओर से दायर की गई जिसमें इनकी रिहाई की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती दी है जिसके जरिए उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया। याचिका में कहा गया है कि यह आदेश गैर कानूनी है और मजिस्ट्रेट के पास उनके मामले में रिमांड जारी करने का कोई अधिकार नहीं है।
पीएफआई के तीन कथित सदस्यों को मथुरा पुलिस द्वारा उस समय गिरफ्तार कर लिया गया था जब वे हाथरस में सामूहिक दुष्कर्म पीड़िता के परिजनों से मिलने जा रहे थे।
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याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता अतीक उर्रहमान और मसूद दुष्कर्म पीड़िता के परिजनों को सांत्वना देने के लिए उनसे मिलने जा रहे थे और टैक्सी ड्राइवर आलम उनका वाहन चला रहा था। उन्हें पांच अक्तूबर, 2020 को मथुरा में हिरासत में ले लिया गया।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल दुर्भाग्य से पुलिस अधिकारियों द्वारा ‘बलि का बकरा’ बनाए गए हैं। इनमें से कोई भी पीएफआई का सदस्य नहीं है और इन्होंने कोई अपराध नहीं किया है जो इन पर लगाई गई धाराओं से बिल्कुल साफ है और प्राथमिकी में लगाए गए आरोप पूरी तरह से गलत हैं और इनके खिलाफ कोई मामला नहीं बनता।
इस याचिका में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के रिमांड आदेश को रद्द करने के अलावा इन याचिकाकर्ताओं को जमानत पर रिहा करने का निर्देश जारी करने का भी अनुरोध किया गया है।
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 14 दिसंबर तय की।
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