नयी दिल्ली, 11 जुलाई उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को अपने पहले के आदेशों में संशोधन करते हुए कहा कि सांसदों/विधायकों से संबंधित मामलों की सुनवाई करने वाली विशेष अदालतों के न्यायिक अधिकारियों के स्थानांतरण के लिए उसकी अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी।
हालांकि, न्यायालय ने इसके लिए कुछ शर्तें भी रखी हैं, जिनमें संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की मंजूरी शामिल है।
शीर्ष अदालत ने अपने 10 अगस्त, 2021 और पिछले साल 10 अक्टूबर के आदेशों को संशोधित किया।
शीर्ष अदालत ने अपने अगस्त 2021 के आदेश में कहा था कि सांसदों या विधायकों के अभियोजन से जुड़ी विशेष अदालतों या सीबीआई अदालतों की अध्यक्षता करने वाले सभी न्यायिक अधिकारी अगले आदेश तक अपने वर्तमान पद पर बने रहेंगे।
बाद में पिछले साल अक्टूबर में, शीर्ष अदालत ने आदेश को संशोधित किया था और निर्देश दिया था कि अब से उच्च न्यायालयों के लिए न्यायिक अधिकारियों के स्थानांतरण को लेकर उसकी पूर्व अनुमति लेना आवश्यक नहीं होगा, जहां स्थानांतरण किसी विशेष तैनाती में उनका कार्यकाल समाप्त होने पर सामान्य प्रक्रिया के तहत किए जाते हैं।
शीर्ष अदालत ने अपने अक्टूबर 2022 के आदेश में कहा था, "हालांकि, यदि उच्च न्यायालय की नीति के अनुसार स्थानांतरण और तैनाती की सामान्य प्रक्रिया के अलावा किसी अन्य कारण से तबादला आवश्यक है, तो इस अदालत की पूर्व अनुमति 10 अगस्त, 2021 के आदेश के संदर्भ में आवश्यक मानी जाएगी।’’
यह मामला प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ के समक्ष मंगलवार को सुनवाई के लिए आया।
पीठ को यह बताया गया कि कई उच्च न्यायालयों ने सांसदों और विधायकों के खिलाफ सुनवाई कर रही विशेष अदालतों की अध्यक्षता करने वाले न्यायिक अधिकारियों के स्थानांतरण की अनुमति मांगने के लिए आवेदन दायर किए हैं।
इसके बाद न्यायालय ने कहा, ‘‘यह सुनिश्चित करने के लिए कि उच्च न्यायालयों का प्रशासनिक कार्य प्रभावित न हो... हम 10 अगस्त, 2021 और 10 अक्टूबर, 2022 के आदेशों को निम्नलिखित शर्तों में संशोधित करते हैं।’’
इसमें कहा गया है कि संबंधित उच्च न्यायालय प्रशासनिक पक्ष पर अपने मुख्य न्यायाधीश की मंजूरी प्राप्त करने के बाद इन विशेष अदालतों के पीठासीन अधिकारियों को स्थानांतरित कर सकता है।
पीठ ने कहा कि अनुमति देते समय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई अन्य न्यायिक अधिकारी वहां तैनात किया जाए, ताकि विशेष अदालत खाली न रहे।
पीठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर 2016 की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए जाने पर राजनेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग के अलावा, आरोपी सांसदों/विधायकों के खिलाफ शीघ्र मुकदमा चलाने और देश भर में इस उद्देश्य के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने की मांग की गई थी।
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