अरुणाचल प्रदेश में मिली सींग वाले मेंढक की नई प्रजाति
अरुणाचल प्रदेश के टेल वन्यजीव अभयारण्य में सींग वाले मेंढक की एक नई प्रजाति मिली है.
अरुणाचल प्रदेश के टेल वन्यजीव अभयारण्य में सींग वाले मेंढक की एक नई प्रजाति मिली है. शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज भारत की समृद्ध जैव विविधता का एक और सबूत है.मेघालय में जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जेडएसआई) के शोधकर्ताओं ने ईटानगर और पुणे के सहयोगियों के साथ मिलकर अरुणाचल प्रदेश के टेल वन्यजीव अभयारण्य से सींग वाले मेंढक की एक नई प्रजाति को खोज निकाला है. इसे वहां की स्थानीय जनजाति के नाम पर 'जेनोफ्रीस अपाटानी' नाम दिया गया है.
शोधकर्ताओं की टीम में जेडएसआई शिलांग के भास्कर सैकिया और बिक्रमजीत सिन्हा, जेडएसआई पुणे के केपी दिनेश और ए शबनम और जेडएसआई ईटानगर की इलोना जैसिंटा खारकोंगोर शामिल थी. इससे संबंधित रिपोर्ट 'रिकार्ड्स ऑफ द जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया' के ताजा अंक में छपी है.
मेंढक की इस प्रजाति को अलग क्यों माना गया
जेडएसआई शिलांग की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि इस टीम के अध्ययन ने अरुणाचल प्रदेश में माओसन सींग वाले मेंढक (जेनोफ्रीस माओसोनेसिस) की पिछली गलत रिपोर्ट को पलट दिया. 2019 में सैकिया और उनकी टीम ने सीमित अनुवांशिक डेटा के कारण 'जेनोफ्रीस अपाटानी' के नमूने की पहचान गलती से 'जेनोफ्रीस माओसोनेसिस' के रूप में कर ली थी.
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उस समय माना गया था कि यह वही प्रजाति है, जो वियतनाम में पाई जाती है. लेकिन 2023 में नए सिरे से शुरू हुए अध्ययन और जांच में दोनों प्रजातियों के बीच कई असमानताएं मिलीं. उसके बाद ही इस टीम ने इस प्रजाति को अलग मानते हुए इसके नामकरण का फैसला किया.
वियतनाम और अरुणाचल की दूरी भी एक फैक्टर
शोध टीम के एक वरिष्ठ सदस्य ने डीडब्ल्यू से बातचीत में जानकारी दी, "2019 में हमने एक अलग प्रजाति की खोज की थी, जो वियतनाम में पाई जाने वाली मेंढक की एक प्रजाति से मिलती-जुलती थी. उस समय हमें लगा कि वह वियतनाम वाली ही प्रजाति है. फिर 2023 में सर्वेक्षण के दौरान हमें पता चला कि वियतनाम की प्रजाति कई अन्य प्रजातियों का मिश्रण है. वहां कुछ और प्रजातियां मिल सकती हैं, जिसे इस पुराने नाम से जाना जाता है."
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अधिकारी ध्यान दिलाते हैं कि अरुणाचल प्रदेश और वियतनाम के बीच की भौगोलिक दूरी करीब 1,600 किलोमीटर है. बीच में कई पहाड़ हैं. यह भौगोलिक दूरी दोनों प्रजातियों के अलग-अलग होने का बड़ा संकेत है, लेकिन पहले इस पक्ष पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया था. बाद में जब शोधकर्ताओं ने समीक्षा की, तो कई अन्य मापदंडों पर पुनर्मूल्यांकन के बाद नतीजों में अंतर पाया गया. अरुणाचल प्रदेश में मिले मेंढक के कई गुण वियतनाम की प्रजाति से मेल नहीं खा रहे थे.
इससे साफ हुआ कि यह एक अलग प्रजाति है. दोनों जगहों की दूरी और पहाड़ियों को देखते हुए वियतनाम की प्रजाति का यहां तक पहुंचना संभव नहीं था. इसलिए शोधकर्ताओं ने इस प्रजाति को नया नाम देने का फैसला किया. अब भविष्य में इस प्रजाति पर और शोध व अध्ययन होंगे और ये जानकारियां इसकी प्रोफाइल में जुड़ती रहेंगी.
हिमालय में जैव विविधता से संपन्न इलाका
मेंढक की इस नई प्रजाति का नाम अरुणाचल प्रदेश की 'अपाटानी' जनजाति के नाम पर रखा गया है. यह जनजाति मुख्य रूप से अरुणाचल प्रदेश की निचली सुबनसिरी घाटी में रहती है और जंगली वनस्पतियों और जीवों के संरक्षण का महत्व समझती है. टेल वन्यजीव अभयारण्य भी इसी इलाके में है.
इससे पहले शोधकर्ताओं ने 2022 में भी पश्चिमी अरुणाचल प्रदेश में मेंढकों की तीन नई प्रजातियों की खोज की थी. इनमें पश्चिमी कामेंग जिले के सेसा व दिरांग से अमोलोप्स टेराओर्किस और अमोलोप्स चाणक्य के अलावा तवांग जिले से अमोलोप्स तवांग शामिल थे.
शोधकर्ताओं का कहना है कि जेनोफ्रीज अपाटानी की यह खोज भारत की समृद्ध जैव विविधता का एक और सबूत है. इसके साथ ही यह देश की प्राकृतिक विरासत को समझने की दिशा में ऐसे अध्ययनों की अहमियत भी रेखांकित करती है. शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में भारत में जेनोफ्रीज प्रजातियों के जैव-भौगोलिक वितरण के बारे में भी जानकारी दी है. ये प्रजातियां पूर्वी हिमालय और भारत-बर्मा (अब म्यांमार) के जैव विविधता से समृद्ध हॉटस्पॉटों में पाई जाती हैं.
टेल वन्यजीव अभयारण्य
अरुणाचल प्रदेश हिमालयी जैव विविधता का एक हॉटस्पॉट है. भारत में फूलों और जीवों की जितनी प्रजातियों हैं, उनमें से करीब 40 फीसदी यहां हैं. प्रकृति और पर्यावरण की इस अनमोल दौलत का एक बेहद संपन्न ठिकाना है, लोअर सुबनसिरी जिले का टेल वन्य जीव अभयारण्य. चार नदियां यहां से गुजरती हैं, जिनके नाम हैं पांगे, सीपू, कारिंग और सुबनसिरी.
सिल्वर फिर के घने जंगल और चीड़ के पेड़ों से ढके इस अभयारण्य में क्लाउडेड तेंदुआ, हिमालयी गिलहरी व हिमालयी काले भालू समेत कुछ अहम लुप्तप्राय प्रजातियां रहती हैं. वनस्पतियों के लिहाज से भी यह काफी समृद्ध इलाका है. प्लियोब्लास्टस सिमोन नामक बांस की एक प्रजाति तो देशभर में सिर्फ यहीं उगती है. फर्न व बुरांश समेत कई वनस्पतियों और फूलों से भरे जंगलों के कारण ट्रैकिंग के शौकीनों के बीच यह काफी लोकप्रिय है.
कई ऐसे दुर्लभ पक्षी भी हैं, जो देश में सिर्फ इसी अभयारण्य में देखे जा सकते हैं. साल 2015 में किए गए एक अध्ययन के दौरान यहां पक्षियों की 130 दुर्लभ प्रजातियों को देखा गया था. शोधकर्ताओं की एक टीम ने इसी साल अप्रैल में यहां 'नेप्टिस पिलायरा' नामक तितली की एक नई प्रजाति की खोज की थी. इस शोध से जुड़ी रिपोर्ट 'ट्रॉपिकल लेपिडोप्टेरा रिसर्च' नामक पत्रिका में छपी थी.
तितली की इस दुर्लभ प्रजाति का जिक्र सबसे पहले रूस के एम.मेनेट्रिएस ने किया था. यह तितली मुख्य रूप से पूर्वी साइबेरिया, कोरिया, जापान, मध्य व दक्षिण-पश्चिम चीन के अलावा पूर्वी एशिया के कई इलाकों में पाई जाती है.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 05, 2024 07:20 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

