देश की खबरें | हिमाचल में मुख्य संसदीय सचिव बनाए गए विधायकों की सदस्यता खत्म की जाए : भाजपा

शिमला, 13 नवंबर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हिमाचल प्रदेश इकाई ने उन छह विधायकों की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की बुधवार को मांग की, जो मुख्य संसदीय सचिव (सीपीएस) के रूप में सेवाएं दे रहे थे।

पार्टी ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के उस फैसले के मद्देनजर यह मांग उठाई, जिसके तहत छह सीपीएस की नियुक्ति रद्द कर दी गई थी और उस कानून को भी अमान्य घोषित कर दिया गया था, जिसके तहत ये नियुक्तियां की गई थीं।

हालांकि, राज्य सरकार में मंत्री राजेश धर्माणी ने कहा कि उक्त छह विधायकों की विधानसभा सदस्यता “सुरक्षित” है।

उच्च न्यायालय के इस फैसले को मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के लिए झटके के तौर पर देखा जा रहा है।

सुक्खू ने कहा कि फैसले का अध्ययन किया जाएगा और राज्य मंत्रिमंडल चर्चा के बाद अगला कदम तय करेगा।

वहीं, हिमाचल प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर ने कहा कि मुख्यमंत्री सुक्खू ने “असंवैधानिक और तानाशाही तरीके से सीपीएस की नियुक्ति का फैसला लिया था और भाजपा सीपीएस के रूप में नियुक्त किए गए सभी विधायकों की सदस्यता रद्द करने की मांग करती है।”

उच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश संसदीय सचिव (नियुक्ति, वेतन, भत्ता, शक्तियां, विशेषाधिकार और संशोधन) अधिनियम, 2006 को बुधवार को निष्प्रभावी घोषित कर दिया।

न्यायमूर्ति विवेक ठाकुर और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इन सीपीएस को हासिल सभी सुविधाओं और विशेषाधिकार को भी तत्काल प्रभाव से वापस लेने का निर्देश दिया।

फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति नेगी ने कहा कि ये पद सार्वजनिक पद पर कब्जा करने वाले हैं और इनके तहत दी जाने वाली सभी सुविधाएं तत्काल प्रभाव से वापस ली जाएं।

सुक्खू ने अपने मंत्रिमंडल के विस्तार से पहले आठ जनवरी 2023 को छह सीपीएस - अर्की विधानसभा क्षेत्र से संजय अवस्थी, कुल्लू से सुंदर सिंह, दून से राम कुमार, रोहड़ू से मोहन लाल बराकटा, पालमपुर से आशीष बुटेल और बैजनाथ से किशोरी लाल की नियुक्ति की थी।

जयराम ने कहा, “इन नियुक्तियों से राज्य के खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ा और सुक्खू सरकार के फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस पार्टी की सरकार संविधान के बजाय अपने प्रावधानों का पालन करना पसंद करती है।”

उन्होंने कहा कि भाजपा पहले दिन से ही सीपीएस की नियुक्ति के खिलाफ थी और उसने फैसले के खिलाफ आवाज उठाते हुए अदालत का रुख किया था।

जयराम ने कहा, “2017 में जब हिमाचल में हमारी सरकार थी, तब हमारे मन में भी यह विचार आया था कि सीपीएस नियुक्त किया जाए या नहीं। लेकिन हमने इसे असंवैधानिक मानते हुए ऐसी कोई नियुक्ति नहीं की।”

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