देश की खबरें | मणिपुर: पैते वेंग इलाके के लोगों के लिए कहर साबित हुई तीन मई की शाम

कोलकाता, 24 जुलाई हिंसाग्रस्त मणिपुर की राजधानी इंफाल में पैते वेंग इलाके के लोगों के लिए तीन मई की शाम कहर साबित हुई, जब अचानक वहां भीड़ एकत्र हो गई, पथराव करने लगी और नारे लगाने लगी। साथ ही, स्थानीय लोगों को अपना घर छोड़कर जाने के लिए मजबूर कर दिया।

मानव विज्ञानी और कुकी उप-जनजाति से संबंध रखने वाले लेखक डॉ. एच कामखेनथांग मणिपुर की राजधानी इंफाल के पैते वेंग इलाके में अपने बंगले के पुस्तकालय में अध्ययन कर रहे थे, तभी उनके घर के पास एकत्र हुई भीड़ ने उपद्रव मचाना शुरू कर दिया।

मणिपुर में तीन मई का पूरा दिन तनावपूर्ण रहा और चुराचांदपुर एवं इंफाल में कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए, जिनमें से कई ने हिंसक रूप ले लिया।

मणिपुर में अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मेइती समुदाय की मांग के विरोध में पर्वतीय जिलों में तीन मई को ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ के आयोजन के बाद राज्य में भड़की जातीय हिंसा में अब तक 160 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।

मणिपुर की आबादी में मेइती समुदाय के लोगों की संख्या लगभग 53 प्रतिशत है और मुख्य रूप से इंफाल घाटी में रहते हैं, जबकि नगा और कुकी जैसे आदिवासियों की आबादी 40 प्रतिशत है और वे पर्वतीय जिलों में रहते हैं।

स्वतंत्र पत्रकार होइह्नु हौजेल ने कहा, ‘‘यह जर्मनी के क्रिस्टलनाख्ट की तरह था... मानो कोई कहर टूट पड़ा हो। तनाव चरम पर पहुंच गया था और भीड़ ने हमारे घरों पर हमला करना शुरू कर दिया था।’’

क्रिस्टलनाख्ट यानी ‘टूटे शीशों की रात’ (नाइट ऑफ ब्रोकन ग्लास) का इस्तेमाल यहूदियों के खिलाफ नौ-10 दिसंबर 1938 को हुए हिंसक दंगों के संदर्भ में किया जाता है।

हौजेल ने तीन मई की रात को याद करते हुए ‘पीटीआई-’ से कहा, ‘‘मैंने मुख्यमंत्री, अन्य मंत्रियों को फोन किए...लेकिन दो से तीन घंटे तक भीड़ को उपद्रव करने से नहीं रोका गया।’’

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