नयी दिल्ली, 21 अगस्त एक नए अध्ययन में सामने आया है कि भारत में कम आय वाले परिवार द्रवित पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की अधिक कीमत, जटिल आवेदन प्रक्रिया, घर तक सिलेंडर नहीं पहुंचने, शिकायतों के निस्तारण के खराब तंत्र जैसी अचड़नों के चलते इसका सतत उपयोग नहीं कर पाते हैं।
यह अध्ययन स्वच्छ वायु और बेहतर स्वास्थ्य (सीएबीएच) परियोजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य अशुद्ध जैवईंधन के उपयोग को छोड़ने में आने वाली अड़चनों की पहचान करना और लोगों के व्यवहार में बदलाव लाना है।
अध्ययन में कई आयामों की जांच की गई, जिसमें जैव ईंधन उपयोग के प्रति महिलाओं का नजरिया, एलपीजी का सतत उपयोग करने, घरेलू वायु प्रदूषण (एचएपी) की धारणाएं और इससे जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में जागरूक करना शामिल हैं।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) का 2016 में अपनी शुरुआत से ही कम आय वाले परिवारों तक एलपीजी पहुंचाने में अहम योगदान रहा है। इसका लक्ष्य वंचित परिवारों को एलपीजी कनेक्शन, एक गैस चूल्हा और 14.2 किलोग्राम का सिलेंडर उपलब्ध कराना है।
मार्च 2023 तक करीब 9.59 करोड़ कनेक्शन जारी किए जा चुके हैं। अध्ययन से पता चला कि एलपीजी का कनेक्शन मिल जाना उसके निरंतर उपयोग की गारंटी नहीं है।
एलपीजी गैस की कीमत अधिक होने से हर कोई उसे खरीदने में समर्थ नहीं है। इसको सतत उपयोग में यही सबसे बड़ी चुनौती है।
लैंगिक मानदंड, प्रणालीगत कारक और एलपीजी लाभों के बारे में जागरुकता की कमी इन चुनौतियों को और बढ़ा देती है।
इस अध्ययन के तहत चयनित क्षेत्रों में प्राथमिक ईंधन का उपयोग करने वाली 18 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं ने 10 समूह चर्चाओं और नौ गहन साक्षात्कारों में भाग लिया। झारखंड जैसे राज्य में 67.8 फीसदी घरों में ठोस ईंधन का उपयोग किया जाता है और दिल्ली में ऐसे घर सिर्फ 0.8 फीसदी हैं।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्षों में से एक यह है कि कम आय वाले परिवार उस ईंधन पर खाना बनाना पसंद करते हैं जो आसानी से उनकी पहुंच में हैं। साथ ही एलपीजी की अधिक कीमत, सुरक्षा, स्वाद और स्वास्थ्य संबंधी धारणाओं के कारण लोग इसे आसानी से नहीं अपनाते।
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