मुंबई, 14 जुलाई बंबई उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ प्रसारित फर्जी सामग्री पर लगाम लगाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों में हाल में किए गए संशोधन ‘‘ज्यादती साबित हो सकते’’ हैं और ‘‘एक चींटी को मारने के लिए हथौड़े’’ का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
न्यायमूर्ति गौतम पटेल और न्यायमूर्ति नीला गोखले की खंडपीठ ने यह भी कहा कि वह अब भी नियमों में संशोधन के पीछे की आवश्यकता को नहीं समझ पाई है और उसे यह अजीब लगता है कि सरकार के एक प्राधिकारी को यह तय करने की पूर्ण शक्ति दी गई है कि क्या नकली, झूठा और भ्रामक है।
पीठ ने कहा कि एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सरकार की भी उतनी ही भागीदारी है, जितनी एक नागरिक की और इसलिए एक नागरिक को सवाल करने तथा जवाब मांगने का मौलिक अधिकार है और सरकार जवाब देने के लिए बाध्य है।
अदालत ने यह भी सवाल किया कि जिन आईटी नियमों के आधार पर किसी सामग्री या सूचना को फर्जी, झूठा और भ्रामक बताया जाएगा, उनकी क्या सीमा निर्धारित की गई है।
न्यायमूर्ति पटेल ने कहा, ‘‘मैं समझ नहीं पा रहा, क्योंकि मुझे यह नहीं पता कि सीमाएं क्या हैं। मैंने केंद्र का हलफनामा दो बार पढ़ा है और मुझे यह समझ नहीं आया कि सीमा क्या निर्धारित की गई।’’
पीठ संशोधित आईटी नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। हास्य कलाकार कुणाल कामरा, ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ और ‘एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन्स’ ने संशोधित नियमों के खिलाफ उच्च न्यायालय का रुख करते हुए इन्हें मनमाना एवं असंवैधानिक बताया है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि इन नियमों का नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर भयानक प्रभाव पड़ेगा।
उच्च न्यायालय ने सवाल किया कि संशोधित नियमों के तहत स्थापित की जाने वाली तथ्यान्वेषी इकाई (एफसीयू) की जांच कौन करेगा।
न्यायमूर्ति पटेल ने कहा कि ऐसी धारणा है कि एफसीयू जो भी कहेगा, वह निर्विवाद रूप से अंतिम सत्य होगा।
एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन्स की ओर से पेश वकील गौतम भाटिया ने संशोधित नियमों के खिलाफ अपनी दलीलें शुक्रवार को रखनी शुरू कीं। भाटिया ने अदालत से कहा कि सोशल मीडिया पर फर्जी सामग्री पर नजर रखने के लिए कम प्रतिबंधात्मक विकल्प उपलब्ध हैं।
पीठ ने कहा कि ऑफलाइन सामग्री में कुछ छंटनी की जाती है, लेकिन सोशल मीडिया मध्यस्थों के लिए तथ्यों की जांच की फिलहाल कोई व्यवस्था नहीं है।
उसने कहा, ‘‘तथ्यों की कुछ हद तक जांच जरूर होनी चाहिए। किसी न किसी स्तर पर, किसी न किसी को सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री के तथ्यों की जांच अवश्य करनी चाहिए, लेकिन आपका (याचिकाकर्ता का) यह कहना सही हो सकता है कि ये (नियम) ज्यादती हैं। आप चींटी को मारने के लिए हथौड़ा नहीं ला सकते।’’
पीठ ने कहा कि जरूरत से ज्यादा सख्ती के पहलू के अलावा वह अभी तक यह भी नहीं समझ पा रही है कि आईटी नियमों में इस संशोधन की क्या जरूरत थी।
न्यायमूर्ति पटेल ने कहा, ‘‘ऐसी कौन-सी चिंता है, जिसके चलते इस संशोधन की आवश्यकता पड़ी? इसके पीछे क्या चिंता है? मुझे अब भी नहीं पता चल पाया है।’’
पीठ ने कहा कि कोई भी व्यक्ति झूठ बोलने के मौलिक अधिकार का दावा नहीं कर रहा है और नागरिक केवल यह कह रहा है कि उसे अपने बयान की सत्यता का बचाव करने का अधिकार है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि संशोधित नियम उन सीमाओं के बारे में भी नहीं बताते कि क्या फर्जी, झूठा और भ्रामक है।
पीठ ने नियमों के असर की बात करते हुए नागरिकता अधिनियम का जिक्र किया। उसने एक काल्पनिक सवाल पूछा, ‘‘अगर कोई अपने विचार लिखता है कि उक्त अधिनियम के प्रावधानों का प्रभाव कुछ इस तरह का था, तो क्या ऐसे विरोधी दृष्टिकोण को फर्जी, झूठा और भ्रामक मानकर हटाने का आदेश दिया जा सकता है? क्योंकि कानून सरकारी कार्य के अंतर्गत आता है।’’
पीठ ने सवाल किया, “क्या नियमों में ऐसा कुछ नहीं है, जो हमें यह बताए कि सीमा क्या है? यह उस चीज की सीमा है, जिसे फर्जी, झूठा और भ्रामक माना जाएगा। क्या अटकलें किसी सामग्री को फर्जी, झूठी और भ्रामक बनाती हैं।”
अदालत ने यह भी जानना चाहा कि सरकार द्वारा गठित एक प्राधिकरण अंतिम रूप से यह कैसे तय कर सकता है कि क्या सच है और क्या फर्जी है।
उसने कहा, ‘‘हमें यह अजीब लगता है कि संशोधित नियम तथ्य अन्वेषण इकाई को यह तय करने की पूर्ण शक्ति देते हैं कि क्या फर्जी है और क्या भ्रामक। यह पूरी तरह से दोहरा है। मेरे विचार से न्यायालय के अलावा किसी को भी सत्य और असत्य का निर्धारण करने का अधिकार नहीं है। यहां तक कि एक अदालत भी यही कहती है कि शायद यह सच भी हो सकता है और शायद झूठ भी।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि संशोधन के बिना भी सरकार के पास प्रेस सूचना कार्यालय (पीआईबी) है, जो कोई गलत या फर्जी सामग्री मिलने पर सोशल मीडिया पर नियमित रूप से पोस्ट करता है।
अदालत ने पूछा कि क्या सरकार का यह कहना है कि यदि संशोधन नहीं किया गया तो सोशल मीडिया मध्यस्थ अनियंत्रित हो जाएंगे।
अदालत ने मामले की आगे की सुनवाई के लिए 27 जुलाई की तारीख तय की। उस दिन सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता केंद्र सरकार की ओर से दलीलें पेश करेंगे।
केंद्र सरकार ने पहले बयान दिया था कि नियमों के तहत तथ्यान्वेषण इकाई को 14 जुलाई तक अधिसूचित किया जाएगा। अदालत ने कहा कि केंद्र का यह बयान 28 जुलाई तक लागू रहेगा।
केंद्र सरकार ने इस साल छह अप्रैल को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम-2021 में कुछ संशोधन की घोषणा की थी, जिसमें फर्जी, झूठी या भ्रामक ऑनलाइन सामग्री की पहचान करने के लिए एक तथ्य अन्वेषण इकाई की स्थापना का प्रावधान भी शामिल है।
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