नयी दिल्ली, 29 मई लगभग 120 साल पुरानी कालका-शिमला रेलवे ट्रेन का संचालन शुरू होने के बाद पहली बार इसका रंग-रूप बदला जाएगा, जिसके तहत ट्रेन में स्वदेश में निर्मित शानदार बोगियां जोड़ी जाएंगी और प्रत्येक बोगी में एक छोटी ‘पैंट्री’ और जैव-शौचालय होंगे।
पंजाब के कपूरथला में रेल कोच कारखाने (आरसीएफ) द्वारा विकसित ये डिब्बे लाल रंग की ‘स्विस’ बोगियों की याद दिलाते हैं।
फिलहाल कालका-शिमला रेलवे (केएसआर) ट्रेन में जो बोगियां इस्तेमाल की जाती हैं, वे 100 वर्ष से भी पहले मुगलपुरा कार्यशाला में बनी थीं, जो अब पाकिस्तान रेलवे का हिस्सा है।
कालका-शिमला ‘नैरो-गेज’ पटरी की चौड़ाई 0.762 मीटर है। यह 96.6 किलोमीटर लंबा रेल लिंक है। 1891 में दिल्ली रेलवे लाइन को कालका से जोड़ा गया था, जिसके लगभग 12 साल बाद नवंबर 1903 में लाइन खोली गई थी।
अधिकारियों ने कहा कि जब रेल कोच कारखाने (आरसीएफ) को कालका-शिमला रेलवे (केएसआर) की बोगियों का डिजाइन तैयार करने और इनके निर्माण की जिम्मेदारी दी गई थी, तो उन्हें दो बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
उन्होंने कहा कि पहली समस्या यह थी कि डिजाइन तैयार करने और सत्यापन के लिए ‘नैरो-गेज ट्रैक’ का नमूना बनाने के लिए कोई डिजिटल डेटा नहीं था। दूसरी समस्या यह थी कि डिजाइन के सत्यापन और मंजूरी के लिए कोई संस्थान नहीं था क्योंकि मूल कार्यशाला अब पाकिस्तान में है।
उन्होंने कहा कि शुरुआत में, कालका कार्यशाला में उपलब्ध पुराने ‘ब्लूप्रिंट’ और ‘स्केच’ का उपयोग करके ‘3डी मॉडल’ बनाए गए थे।
रेलवे बोर्ड ने फरवरी 2022 में प्रस्तावित डिजाइन को अंतिम मंजूरी दी थी। बोगियों को प्रथम श्रेणी ‘एसी चेयर कार’, ‘एसी चेयर कार’, ‘गैर-एसी चेयर कार’ आदि के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
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