देश की खबरें | उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों के बाद भी हो रहीं खुले बोरवेल में गिरने की घटनाएं
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नयी दिल्ली, 15 जून उच्चतम न्यायालय ने खाली पड़े बोरवेल और ट्यूबवेल में लोगों तथा ज्यादातर छोटे बच्चों के गिरने की घटनाओं से बचने के लिये एक दशक से भी पहले दिशा-निर्देश जारी किये थे, लेकिन तब से अब तक स्थिति में बहुत बदलाव नहीं दिख रहा है।
यह मुद्दा कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के जंजगीर चंपा जिले में 11 वर्षीय लड़के राहुल साहू के 80 फुट गहरे गड्ढे में गिर जाने के बाद फिर से चर्चा में आया, जिसे 104 घंटे तक चले अभियान के बाद मंगलवार रात बाहर निकाला गया।
हालांकि पंजाब के होशियारपुर में 300 फुट गहरे बोरवेल में गिरा छह साल का रितिक भाग्यशाली नहीं रहा और सात घंटे चले अभियान के बाद उसे बाहर निकालकर अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।
उच्चतम न्यायालय ने 11 फरवरी 2010 को इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी किये थे। इन दिशानिर्देशों में वेल के निर्माण के समय आसपास कंटीले तार लगाने और वेल को सही तरीके से ढंकने समेत कई निर्देश दिये थे।
तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने देश में इस तरह की दुर्घटनाओं से संबंधित एक पत्र याचिका पर 13 फरवरी, 2009 को स्वत: संज्ञान लिया था, जिसके बाद ये दिशा-निर्देश जारी किये गए थे।
शीर्ष अदालत ने अधिकारियों से आदेश का व्यापक प्रचार करने को भी कहा था।
न्यायालय ने 11 फरवरी, 2010 के अपने आदेश में कहा था, '' बोरवेल और ट्यूबवेल या छोड़े गए वेल में बच्चों के गिरने और फंसने से संबंधित कई मामलों पर अदालत का ध्यान दिलाया गया है। ऐसे मामले विभिन्न राज्यों से सामने आ रहे हैं। इसलिये हमने खुद ही पहल करके इस तरह की घटनाओं को रोकने को लेकर तत्काल कदम उठाने के लिए विभिन्न राज्यों को नोटिस जारी किया है।''
शीर्ष अदालत ने कहा था कि भूमि या परिसर के मालिक, बोरवेल या ट्यूबवेल बनाने के लिए कोई भी कदम उठाने से कम से कम 15 दिन पहले क्षेत्र में संबंधित अधिकारियों जैसे जिलाधिकारी, सरपंच, भूजल विभाग, सार्वजनिक स्वास्थ्य या नगर निगम के संबंधित अधिकारी को इस बारे में सूचित करेंगे।
अदालत ने निर्देश दिया था कि खुदाई करने वाली सभी सरकारी, अर्ध-सरकारी या निजी एजेंसियों का पंजीकरण अनिवार्य होना चाहिए।
अदालत ने कहा था, ''कुएं के पास निर्माण के समय वहां एक सूचना पट्टी लगानी होगी, जिस पर वेल के निर्माण या पुनर्वास के समय खुदाई करने वाली एजेंसी का पूरा पता और उपयोगकर्ता एजेंसी या मालिक का पूरा पता लिखा होना चाहिये।''
इसके अलावा भी अदालत ने इस संबंध में कई दिशा-निर्देश जारी किये थे, लेकिन उन पर आज तक पूरी तरह अमल नहीं हो पाया है।
खुले बोरवेल और ट्यूबवेल में बच्चों के गिरने के मामलों में वृद्धि जारी रहने के चलते शीर्ष अदालत ने तीन फरवरी, 2020 को अधिवक्ता जी. एस. मणि द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति व्यक्त की, जिन्होंने इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने में विफल रहने के लिए अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।
शीर्ष अदालत ने 2010 के दिशा-निर्देशों पर अमल को लेकर केंद्र सरकार और सभी राज्य व केंद्र शासित प्रदेश सरकारों से जवाब मांगा है। इस याचिका को 13 जुलाई को सुनवाई के लिये सूचीबद्ध किया गया है।
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