नयी दिल्ली, 24 जुलाई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रधान सचिव पी के मिश्रा ने सोमवार को जी-20 आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्य समूह की बैठक में आगाह करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाओं का प्रभाव अब दूर भविष्य में नहीं, बल्कि अभी ही सामने आ रहा है और यह बहुत बड़ा है।
मिश्रा ने चेन्नई में आयोजित जी20 आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्य समूह की तीसरी बैठक में अपने उद्घाटन भाषण में कहा, ‘‘छोटे बदलावों का समय बीत चुका है। हमें नए आपदा जोखिमों को रोकने और मौजूदा आपदा जोखिमों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक प्रणालियों में बदलाव करने की आवश्यकता है।’’
उन्होंने कहा कि भारत ने जी20 की अध्यक्षता के पिछले आठ महीनों के दौरान उत्साहपूर्वक भाग लिया है। उन्होंने कहा कि देश भर में 56 स्थानों पर अब तक 177 बैठकें हो चुकी हैं।
मिश्रा ने कहा, ‘‘विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने विचार-विमर्श में सक्रिय रूप से भाग लिया है। उन्हें भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक विविधता की भी झलक मिली है। जी20 एजेंडे के महत्वपूर्ण पहलुओं में काफी प्रगति हुई है। मुझे यकीन है कि डेढ़ महीने में होने वाली शिखर बैठक एक ऐतिहासिक घटना होगी।’’
उन्होंने कहा कि इस कार्य समूह की पहली बैठक मार्च में गांधीनगर में हुई थी। उन्होंने कहा कि तब से दुनिया ने कुछ अभूतपूर्व आपदाएं देखी हैं।
मिश्रा ने चुनौतियों के पैमाने को रेखांकित करने के लिए कुछ मौसमी घटनाओं का हवाला दिया, जिनमें लगभग पूरे उत्तरी गोलार्ध के शहरों में लू चलने, कनाडा में जंगलों में आग लगने और उत्तर अमेरिका के कई हिस्सों में धुंध के कारण शहरों के प्रभावित होने तथा पिछले 45 वर्षों में दिल्ली में सबसे भीषण बाढ़ आना शामिल है। उन्होंने कहा कि भारत ने भी अपने पूर्वी और पश्चिमी तटों पर प्रमुख चक्रवाती गतिविधि देखी है।
मिश्रा ने कहा, ‘‘जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाओं का प्रभाव अब दूर भविष्य में नहीं, वह पहले ही सामने है और बहुत बड़ा है। वे आपस में जुड़े हुए हैं और वे पूरे ग्रह पर हर किसी को प्रभावित करते हैं। आज दुनिया जिन चुनौतियों का सामना कर रही है, वे इस कार्य समूह के महत्व को रेखांकित करती हैं।’’
उन्होंने कहा कि हालांकि समूह ने चार महीने की छोटी सी अवधि में काफी प्रगति की है और अच्छी गति उत्पन्न की है, लेकिन इसे और अधिक करने की जरूरत है। मिश्रा ने कहा, "इस कार्य समूह की महत्वाकांक्षा हमारे सामने आने वाली समस्याओं के पैमाने से मेल खानी चाहिए।"
उन्होंने कहा कि यह एक तथ्य है कि अलग-अलग राष्ट्रीय और वैश्विक प्रयासों में सक्रिय रूप आपसी मेल होना चाहिए ताकि उनके सामूहिक प्रभाव को अधिकतम किया जा सके। उन्होंने कहा कि समूह टुकड़ों में प्रयासों को बर्दाश्त नहीं कर सकता जो संकीर्ण संस्थागत दृष्टिकोण से प्रेरित हों।
मिश्रा ने कहा, ‘‘हमें समस्या-समाधान दृष्टिकोण से प्रेरित होना चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव की "सभी के लिए प्रारंभिक चेतावनी" पहल इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण है। उन्होंने कहा, "आपदा जोखिम न्यूनीकरण के वित्तपोषण के क्षेत्र में, यह महत्वपूर्ण है कि हम आपदा जोखिम न्यूनीकरण के सभी पहलुओं के वित्तपोषण के लिए सभी स्तरों पर संरचनात्मक तंत्र अपनाएं। भारत में पिछले कुछ वर्षों में, हमने आपदा जोखिम न्यूनीकरण के वित्तपोषण के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘अब हमारे पास न केवल आपदा प्रतिक्रिया, बल्कि आपदा शमन, तैयारी और बहाली के वित्तपोषण के लिए एक पूर्वानुमानित तंत्र है। क्या हमारे पास वैश्विक स्तर पर भी इसी तरह की व्यवस्था हो सकती है?’’
मिश्रा ने कहा कि समूह को आपदा जोखिम में कमी के लिए उपलब्ध वित्तपोषण की विभिन्न धाराओं के बीच अधिक अभिसरण करने की आवश्यकता है और जलवायु वित्त को आपदा जोखिम में कमी के लिए वित्तपोषण का एक अभिन्न अंग होना चाहिए।
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