बाढ़ से होने वाले नुकसान को कैसे किया जा सकता है कम

भारत के उत्तरी हिस्से और अमेरिका के न्यूयॉर्क में भारी बारिश और बाढ़ कहर बरपा रही है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

भारत के उत्तरी हिस्से और अमेरिका के न्यूयॉर्क में भारी बारिश और बाढ़ कहर बरपा रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते जलवायु संकट के मद्देनजर शहरों का निर्माण इस तरह से करना होगा कि वे मौसम की मार से बच सकें.पिछले दिनों अमेरिका से लेकर भारत, चीन, ब्रिटेन और स्पेन तक में भारी बारिश के कारण अचानक बाढ़ आ गई. बीते रविवार को भारत के हिमाचल प्रदेश में बाढ़ के कारण एक पुल ढह गया, कई घर मलबे के ढेर में तबदील हो गए और 22 लोगों की मौत हो गई.

बीते सप्ताह के अंत में, मानसून की अत्यधिक भारी शुरुआत के कारण हिमाचल के कई जिलों में एक दिन में ही एक महीने के बराबर बारिश हुई. मौसम विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि पाकिस्तान में हुए भूस्खलनके लिए भी यह भारी बारिश जिम्मेदार है.

दिल्ली में यमुना से खतरा

विभाग का कहना है कि आने वाले समय में भी भारी बारिश होने का अनुमान है. इससे पूरे क्षेत्र में सड़कों पर पानी भर जाएगा, ट्रैफिक जाम होगा और बिजली कटौती हो सकती है. हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में भारी बारिश के बाद हालात बहुत खराब हैं. गंगा, रावी, चिनाब, ब्यास, सतलुज समेत कई नदियां उफान पर हैं. इनके तेज बहाव में कई जगहों पर मकान, गाड़ियां और पुल बह गए हैं.

दिल्ली में यमुना नदी का जल स्तर ऐतिहासिक रूप से काफी ज्यादा बढ़ गया है और यह खतरे के निशान 205 मीटर को पार कर गया है. 13 जुलाई, 2023 को यमुना में जल स्तर 208 मीटर को पार कर गया. इससे पहले 1978 में जल स्तर 207.49 मीटर तक पहुंचा था. दिल्ली के निचले इलाके जलमग्न हो गए हैं. लोग अपने घर-बार छोड़कर सड़कों पर रात गुजारने को मजबूर हैं.

ज्यादा गर्मी पड़ने पर होती है भारी बारिश

बीते रविवार की रात न्यूयॉर्क की हडसन वैली में भी तेज बारिश के कारण बाढ़ आ गई. सड़कों पर पानी और कीचड़ भर गया. यातायात ठप्प हो गया और कम से कम एक व्यक्ति की मौत की खबर है. अमेरिका के राष्ट्रीय मौसम सेवा के पूर्वानुमान केंद्र में मौसम विज्ञानी ब्रायन जैक्सन ने रॉयटर्स को बताया कि उत्तर में ठंडे महीनों की तरह मौसम का पैटर्न बन गया है और यह नियमित गर्मी की नमी के साथ संपर्क में है.

पेंसिल्वेनिया और दक्षिणी न्यूयॉर्क राज्य रविवार को बारिश से सबसे अधिक प्रभावित हुए, लेकिन मौसम विभाग सोमवार को न्यू इंग्लैंड राज्य के कुछ हिस्सों में व्यापक और भारी बाढ़ का अनुमान लगा रहा था. जैक्सन ने कहा, "हमें आशंका है कि स्थानीय स्तर पर काफी ज्यादा विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा.” मौसम विभाग ने संवेदनशील क्षेत्रों के लोगों को तुरंत सुरक्षित और ऊंची जगहों पर जाने का अनुरोध किया है.

कुछ दिनों पहले स्पेन के उत्तर-पूर्वी शहर सरागोसा (Zaragoza) में अचानक बाढ़ आ गई थी. सड़कें पूरी तरह जलमग्न हो गई थीं और कारें खिलौनों की तरह बह रही थीं. इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर भी काफी वायरल हुआ.

अमेरिका में रहने वाले मौसम विज्ञानी और जलवायु के मुद्दों को कवर करने वाले पत्रकार एरिक होल्टहॉस ने ट्वीट किया, "गर्म हवा की वजह से पानी का वाष्पीकरण काफी ज्यादा होता है. काफी ज्यादा गर्मी पड़ने से भारी बारिश होती है और भयंकर बाढ़ आती है.” उन्होंने यह भी बताया कि इस सप्ताह स्पेन में तापमान 47 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच सकता है. 9 जुलाई को उत्तरी ब्रिटेन के शेफील्ड शहर में भीषण गर्मी के तूफान के कारण अचानक बाढ़ आ गई.

जलवायु के अनुकूल बने रणनीतियां

बढ़ते जलवायु संकट की वजह से जर्मनी से लेकर पाकिस्तान तक, कई देश भयंकर बाढ़ का सामना कर रहे हैं. इसे देखते हुए बड़ा सवाल यह है कि आखिर समुदाय बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए क्या उपाय अपना सकते हैं.

पश्चिमी यूरोप में कम से कम 200 लोगों की जान लेने वाली 2021 की बाढ़ के बाद डीडब्ल्यू से बात करते हुए जर्मनी के जीगन यूनिवर्सिटी में टिकाऊ भवन और डिजाइन पर काम करने वाली सिविल इंजीनियरिंग प्रोफेसर लामिया मेसारी-बेकर ने कहा था कि इमारतों का निर्माण इस तरह करना चाहिए कि वह बाढ़ के पानी का सामना कर सके. भूकंप-रोधी डिजाइन की तरह यह भी महत्वपूर्ण है.

इमारतों को बाढ़ से निपटने लायक बनाने के लिए नींव की गहराई, संरचनात्मक डिजाइन और निर्माण सामग्री को विशेष रूप से चुना जाता है. मेसारी-बेकर ने कहा, "हमें मजबूत बेसमेंट बनाना चाहिए, ताकि उसमें पानी भर सके और लोगों को जल्दी से सुरक्षित रूप से बाहर निकलने का मौका मिल सके. साथ ही, बाहरी दीवारों और छतों को भी मजबूत बनाने की जरूरत है.”

विशेषज्ञ अन्य उपायों के तहत सीवेज कनेक्शन में रिटेंशन वॉल्व इस्तेमाल करने पर जोर देते हैं, जिससे बाढ़ का पानी घरों में जल्दी नहीं घुसता है. साथ ही, वे इमारतों के निचले हिस्से की खिड़कियों और दरवाजों को वॉटरप्रूफ बनाने की सलाह देते हैं.

पॉट्सडम विश्वविद्यालय में प्राकृतिक आपदाओं पर शोध करने वाली प्रोफेसर एनेग्रेट थिएकेन ने 2021 की बाढ़ के मद्देनजर डीडब्ल्यू को बताया, "नुकसान के आकलन से पता चलता है कि निजी तौर पर एहतियाती उपाय अपनाने से बाढ़ से होने वाले नुकसान को काफी कम किया जा सकता है.” उन्होंने कहा कि घरों को गर्म करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ईंधन टैंक जैसे विनाशकारी चीजों को भी सुरक्षित रखने की जरूरत है.

उन्होंने आगे कहा, "तेल रिसाव होने की वजह से अगल-बगल के इमारतों को भी नुकसान पहुंच सकता है. अगर काफी ज्यादा तेल का रिसाव होता है, तो स्थिति गंभीर हो सकती है और इमारतें रहने लायक नहीं रह जातीं. बाढ़ निरोधक बनाने से तेल टैंकों को नुकसान से बचाया जा सकता है. इससे इमारत और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है.”

शहरों को मौसम की मार झेलने लायक बनाना

सिर्फ इमारतों पर ध्यान केंद्रित करने से समस्या हल नहीं होगी. शहरों और इसके आसपास के इलाकों में जलाशयों के साथ-साथ बांधों को मजबूत बनाकर पानी को नियंत्रित करने के बारे में भी सोचने की जरूरत है, ताकि बाढ़ का पानी घरों के बेसमेंट में पहुंचने से रोका जा सके. ये बांध और जलाशय अचानक होने वाली बारिश के पानी को जमा करने में मददगार साबित होते हैं.

जर्मन शहर बॉन के दक्षिण में स्थित आहर घाटी 2021 की बाढ़ में पूरी तरह तबाह हो गया था. यहां आयी बाढ़ से पता चलता है कि संकरी घाटियों की छोटी नदियों में पानी को फैलने के लिए ज्यादा जगह नहीं होने से कुछ ही घंटों की मूसलाधार बारिश भारी बाढ़ ला सकती है. मेसारी-बेकर ने कहा कि ऐसी जगहों पर शहरों को पानी के बढ़ते स्तर से बचाने के लिए, नहरों और बांधों को ऊंचा करने के साथ-साथ उनके क्षेत्रफल को भी बढ़ाने की जरूरत है.

हालांकि, ऐसा करना थोड़ा खर्चीला काम है. उदाहरण के लिए, किसी नहर का विस्तार करने पर प्रति किलोमीटर कम से कम 10 लाख यूरो का खर्च आता है. साथ ही, घाटी जितनी संकरी होगी खर्च उतना ही बढ़ेगा.

जर्मनी के टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ डार्मश्टाट में हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग के प्रोफेसर बोरिस लेहमैन ने कहा, "ऐसी चरम घटनाओं से बुनियादी ढांचों की सुरक्षा करने के लिए हमारे जल प्रबंधन और हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग सिस्टम के मौजूदा डिजाइन पर्याप्त नहीं हैं. हाल में आयी आपदाओं से होने वाले नुकसान से यह साफ तौर पर पता चलता है.”

विशेषज्ञों ने जोर दिया कि हमें ऐसे ढांचे बनाने पर तुरंत काम करना चाहिए जो भविष्य में भी सुरक्षित रह सकें. हालांकि, जर्मनी और बेल्जियम में आयी बाढ़ के बाद लेहमैन ने कहा कि सिर्फ बेहतर निर्माण से सभी समस्याओं के हल की उम्मीद नहीं की जा सकती.

उन्होंने कहा, "तकनीकी, आर्थिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से यह संभव नहीं है कि चरम मौसम की घटनाओं के कारण वातावरण और बुनियादी ढांचे को होने वाले नुकसान का पूरी तरह से पुनर्मूल्यांकन और पुनर्निर्माण किया जा सके. यह भी संभव नहीं है कि पूरी तरह उनकी सुरक्षा की जा सके.”

बाढ़ की रोकथाम के लिए प्रकृति आधारित उपाय

यही वजह है कि योजना बनाने वालों और इंजीनियरों को प्रकृति को नियंत्रित करने की जगह उसके मुताबिक काम करने के तरीके खोजने होंगे. जहां तक संभव हो, नदियों को प्राकृतिक स्वरूप में बहने दिया जाए. उनकी दिशा बदलने या उनके बहाव को सीधा नहीं किया जाना चाहिए. लेहमैन ने कहा कि ऐसा करने से बाढ़ की स्थिति के दौरान पानी जमा हो जाता है और उसकी मात्रा बढ़ जाती है.

नदियों को सीमित करने की जगह बाढ़ के मैदानों के लिए जगह बनाना चाहिए. इससे नदियों में पानी ज्यादा होने पर ये बाढ़ के मैदान जलाशय के तौर पर काम करते हैं. 2000 के दशक की शुरुआत में कई विनाशकारी बाढ़ की घटनाओं के बाद पूर्वी जर्मनी में एल्बे नदी के किनारे बाढ़ के मैदानों का विस्तार किया गया.

दूसरा उपाय यह है कि शहरों को इस तरह बसाया जाए कि पानी ज्यादा से ज्यादा जगहों पर फैल सके और वह एक जगह इकट्ठा न हो. जर्मन शहर लाइषलिंगेन (Leichlingen) हाल के वर्षों में कई बार भीषण बाढ़ की चपेट में आया. जल प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए यहां एक नए मॉडल को प्रयोग के तौर पर आजमाया जा रहा है जिसे ‘स्पंज सिटी' के नाम से जाना जाता है.

विचार यह है कि छतों, चौराहों और सड़कों से बारिश के पानी को सड़क के किनारे घास से ढकी नालियों में डाला जाए. फिर अतिरिक्त पानी को प्राकृतिक रूप से बहने दिया जाए और स्थानीय भूजल में जोड़ा जाए. इससे जल प्रबंधन के बुनियादी ढांचे पर भार कम होगा. साथ ही, अतिरिक्त पानी को इकट्ठा करने के लिए बड़े-बड़े टंकी भी बनाए जाएंगे और यहां जमा पानी का इस्तेमाल शहर में मौजूद घास के मैदानों की सिंचाई के लिए किया जाएगा.

समुदायों को सशक्त बनाने की जरूरत

बुनियादी ढांचे में सुधार और बेहतर जल प्रबंधन से लोगों को तब तक मदद नहीं मिलेगी, जब तक उन्हें यह नहीं पता होगा कि बाढ़ आने पर उससे किस तरह निपटना है. यही वजह है कि टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ डार्मश्टाट के हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग विशेषज्ञ लेहमैन ने सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया.

उन्होंने कहा, "विशेष रूप से जब चरम मौसम के कारण अचानक बाढ़ आती है, तो न सिर्फ काफी ज्यादा पानी होता है बल्कि उसके साथ तैरता हुआ मलबा और कचरा भी भारी मात्रा में होता है. जो लोग इस पानी में जाते हैं उनके डूबने और चोटिल होने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए, जनता को इस बारे में जागरूक करना होगा कि ऐसी चरम स्थितियों में उन्हें क्या करना चाहिए. उदाहरण के लिए, अगर उनकी कार तेज बहाव में फंस जाती है, तो किस तरीके से खुद का बचाव करना चाहिए.”

उन्होंने आगे कहा, "उन्हें तुरंत पानी से दूर जाना चाहिए और जितनी जल्दी हो सके सुरक्षित स्थानों पर शरण लेनी चाहिए. हमें विद्यालयों से ही ऐसे नियमों की जानकारी देनी चाहिए. आपातकालीन स्थिति में यह जानकारी किसी की जान बचाने में मददगार साबित हो सकती है.”

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