नयी दिल्ली, एक मार्च दिल्ली उच्च न्यायालय ने कर्मचारियों को वेतन देने में देरी और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने में विफलता को लेकर शुक्रवार को दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) की खिंचाई की। अदालत ने आगाह किया कि अगर वह आर्थिक रूप से सक्षम नहीं बना तो उसके विघटन का निर्देश दिया जा सकता है।
नगर निगम द्वारा वेतन और पेंशन का भुगतान नहीं किए जाने को लेकर दाखिल विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल किया कि जो निकाय अपने कर्मचारियों के वेतन और पेंशन का भुगतान नहीं कर सकता वह क्या विकास कार्य कर सकता है। अदालत ने दिल्ली नगर निगम के स्थान पर ‘बेहतर प्रणाली’ बनाने की वकालत की।
अदालत ने कहा, ‘‘अगर आप वेतन का भुगतान नहीं कर सकते, अगर आप सातवें वेतन आयोग को लागू नहीं कर सकते, तो आपसे कैसे विकास कार्य की उम्मीद की जा सकती है? कौन ठेकेदार आपके साथ काम करेगा? जो वेतन का भुगतान नहीं कर सकते , तो विकास कार्य क्या करेंगे।’’
एमसीडी का पक्ष रख रहे अधिवक्ता ने कहा कि नगर निकाय के एकीकरण के बाद स्थितियों में सुधार हुआ है और जनवरी महीने तक वेतन और पेंशन का भुगतान किया गया है।
अदालत ने रेखांकित किया कि कर्मचारियों और पेंशनभोगियों द्वारा दायर याचिकाएं सात वर्षों से लंबित है। पीठ ने कहा कि एमसीडी ‘‘गरीब लोगों को दांव पर नहीं लगा सकती’ क्योंकि उनके बकाया का भुगतान धर्मार्थ कार्य नहीं है।
अदालत ने एमसीडी को फरवरी महीने के बकाये का भुगतान 10 दिनों के भीतर करने का निर्देश दिया। पीठ में न्यायमूर्ति मनमीत पीएस अरोड़ा भी शामिल हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘ आपको लगता है कि यह कोई धर्मार्थ कार्य है जो आप कर रहे हैं। यह कानूनी देनदारी है। हर महीने, वे नहीं आ सकते। आपको समय पर भुगतान करना होगा। आप इस तरह देर नहीं कर सकते हैं।’’
अदालत ने कहा, ‘‘अपने आप को वित्तीय रूप से सबल बनाएं। यदि आप नहीं कर सकते, तो आपके बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। इससे कुछ बेहतर प्रणाली सामने आनी चाहिए।’’
पीठ ने कहा कि कानून ने केंद्र को एमसीडी को भंग करने का अधिकार दिया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र की ओर से पेश वकील को मौखिक आदेश दिया कि वह किसी भी प्रस्तावित विघटन के संबंध में एमसीडी को नोटिस जारी करने के पहलू पर निर्देश लेकर आएं।
पीठ ने कहा कि अब दिल्ली सरकार और एमसीडी ‘एक पक्ष के हैं’ तथा नगर निकाय के वित्तीय मामलों को व्यवस्थित किया जाना चाहिए।
अदालत ने दिल्ली सरकार के वकील से कहा, ‘‘... दबाव की कार्रवाई की जा रही है। आप कहते हैं कि आप भुगतान नहीं करेंगे, केंद्र को भुगतान करना होगा। ये किसी आतंकवादी समूह के लोग नहीं हैं।’’
एमसीडी के वकील ने सलाह दी कि अदालत मामले के समाधान के लिए सभी पक्षकारों की बैठक बुलाने का निर्देश दे।
इस पर अदालत ने कहा, ‘‘यह पहले ही काफी हो चुका है।’’ पीठ ने कहा कि नगर निकाय ‘स्वत: बैठक कर सकता है।’’ पीठ ने कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप बकाए का भुगतान संबंधी मुद्दे को सुलझाने के लिए निकाय को समय दे दिया।
अदालत ने एमसीडी को आगाह करते हुए कहा, ‘‘या तो इन विवादों का समाधान करें या केंद्र से हमें कहना होगा कि आपका विघटन करने की जरूरत है। अगर आप अपना घर ठीक नहीं कर सकते तो हमें घर को बंद करना होगा।’’
पीठ ने कहा, ‘‘अक्षम लोगों को बताने की जरूरत है कि उनके लिए कोई संभावना नहीं है। आप अपनी अकुशलता और भ्रष्टाचार की वजह से मुकदमे बढ़ाते हैं।’’
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