देश की खबरें | ग्रामीण क्षेत्रों के डॉक्टरों को प्रोत्साहन देने की अनिच्छा पर बिहार सरकार को उच्च न्यायालय की फटकार

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पटना, 31 मई बिहार सरकार की इस दलील पर पटना उच्च न्यायालय ने उसे फटकार लगाई कि ग्रामीण इलाकों में सेवारत डॉक्टरों को स्नातकोत्तर प्रवेश परीक्षा में प्रोत्साहन अंक देने से शहरी इलाकों में तैनात डॉक्टरों पर विपरीत असर पड़ सकता है।

मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने 28 मई को दिए अपने फैसले में राज्य सरकार के रुख को खारिज करते हुए इसे ‘अतार्किक, अवैध और अनैतिक’ करार दिया।

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अदालत ने टिप्पणी की कि, ‘‘ग्रामीण क्षेत्र में रिक्तियां बहुत अधिक और पूरी तरह से असंगत हैं।’’

अदालत ने इसके साथ ही रेखांकित किया कि इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात डॉक्टरों के त्याग को स्वीकार किया है और पाया कि उम्मीदवार की शैक्षणिक योग्यता में आम लोगों की बेहतरी के लिए की गई सेवा को भी शामिल किया जाना चाहिए।

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पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत ने ग्रामीण इलाकों में पदों के खाली रहने के बीच शहरी इलाकों में डॉक्टरों की बड़ी संख्या को भी संज्ञान में लिया।

अदालत ने इस पर भी खेद जताया कि बिहार देश का सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व वाला राज्य है और इसमें भी अधिकतर आबादी ग्रामीण है। इसके बावजूद शहरी क्षेत्रों में तैनात 1,544 सरकारी डॉक्टरों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 1,333 डॉक्टर तैनात हैं।

उच्च न्यायालय ने इस तथ्य पर भी नाराजगी जताई कि राज्य में स्वीकृत 11,645 चिकित्सकों के पदों में से 8,768 पद खाली हैं जिनमें से 5,674 पद ग्रामीण, दूरदराज और दुर्गम इलाको के हैं।

अदालत ने कहा, ‘‘ डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों को तैनाती के लिए प्रोत्साहित करना...जनहित में हैं... क्या ऐसा है कि शहरी क्षेत्रों में डॉक्टरों की तैनाती से वहां के आम लोगों के सामान्य स्वास्थ्य में सुधार हुआ है? ... हमारी समझ से ऐसा नहीं है। ऐसे में अधिकतर डॉक्टरों की शहरी क्षेत्रों में तैनाती से कैसे किसी की मदद होगी, सिवाय कुछ निहित स्वार्थों के। ’’

पीठ ने टिप्पणी की कि बिहार में यह स्वीकार किया गया तथ्य है कि ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में पद खाली हैं क्योंकि डॉक्टर ऐसे इलाकों में कार्य नहीं करना चाहते हैं।

अदालत ने कहा, ‘‘ ...और इस वजह से भारतीय चिकित्सा परिषद ने डॉक्टरों को प्रोत्साहित करने के लिए ग्रमीण क्षेत्रों में काम करने वाले डॉक्टरों को नीट परीक्षा के अंकों में 10 से 30 प्रतिशत भारांश देने का फैसला किया।’’

पीठ ने कहा, ‘‘ निसंदेह लाभ तय करना सरकार का विशेषाधिकार है लेकिन इसका इस्तेमाल तार्किक तरीके से किया जाना चाहिए न कि मनमाने तरीके से।’’

उच्च न्यायालय ने बिहार प्रवेश संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा बोर्ड को स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए नये सिरे से मेरिट सूची तैयार करने का निर्देश दिया।

अदालत ने करीब 50 पृष्ठों के आदेश में कहा कि राज्य के मुख्य सचिव मौजूदा कोविड-19 महामारी के बाद हालात सामान्य होने पर ग्रामीण, दूरदराज व दुर्गम इलाकों में रिक्त पदों को स्थानांतरण या भर्ती की प्रक्रिया के जरिये यथासंभव भरने का प्रयास करेंगे।

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