देश की खबरें | एनपीसीडीसीएस में मदिरा रहित वसा यकृत बीमारियों को शामिल करने के लिये दिशानिर्देश जारी

नयी दिल्ली, 22 फरवरी गैर संचारी रोगों से निपटने के कदम के तौर पर एनएएफएलडी (मदिरा रहित वसा यकृत रोग) की रोकथाम के महत्व को रेखांकित करते हुए स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्धन ने सोमवार को इन्हें एनपीसीडीसीएस (कैंसर, मधुमेह, हृदय रोगों और पक्षाघात की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिये राष्ट्रीय कार्यक्रम) में सम्मिलित करने के लिए यहां संचालनात्मक दिशानिर्देशों पेश किए।

मदिरा के इस्तेमाल, हेपेटाइटिस या दवाओं जैसे द्वितीयक कारणों के अभाव में यकृत में वसा के असमान्य रूप से जमा होने को एनएएफएलडी कहते हैं। वर्धन ने कहा कि यह एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है क्योंकि इससे यकृत में कई तरह की गड़बड़ियां हो सकती हैं और गैर मदिरा स्टेटोहेपेटाइटिस (एनएएसएच) व यकृत कैंसर तक हो सकता है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के एक बयान में वर्धन को उद्धृत करते हुए कहा गया, “बीते दो दशकों में एनएएसएच के वैश्विक मामले दो गुने हो गए हैं। 1990 में वैश्विक रूप से एनएएसएच के 40 लाख मामले थे जो 2017 में बढ़कर 94 लाख मामलों तक पहुंच गए। एनएएफएलडी भारत में यकृत की बीमारियों के अहम कारण के तौर पर उभर रहा है।”

देश पर गैरसंचारी रोगों के भार से निपटने में एनएएफएलडी को कम करने के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया, “महामारी विज्ञान के अध्ययन से पता चलता है कि भारत में सामान्य आबादी में एनएएफएलडी की पूर्व मौजूदगी करीब 9 से 32 प्रतिशत है और उसमें भी अधिक वजन वाले या मोटे लोगों तथा मधुमेह या पूर्व मधुमेह के चरण वाले लोगों में इसका प्रसार ज्यादा है।”

उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं ने पाया कि टाइप 2 मधुमेह वाले 40 से 80 प्रतिशत लोगों में और मोटापे के शिकार 30 से 90 प्रतिशत लोगों में एनएएफएलडी है।

उन्होंने कहा कि अध्ययन से संकेत मिलते हैं कि जिन लोगों को एनएएफएलडी होता है उनमें हृदयरोग होने का खतरा ज्यादा रहता है। एनएएफएलडी में हृदय रोग मौत की सबसे सामान्य वजह हैं। एक बार यह रोग हो गया तो इसका कोई विशेष उपचार नहीं है और स्वास्थ्य में सुधार, वजन कम करने, स्वस्थ जीवनशैली को लक्षित करने वाले पहलुओं को अपनाकर एनएएफएलडी से मृत्युदर व रुग्णता दर को रोका जा सकता है।

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