देश की खबरें | हरित अधिकरण ने भूजल दोहन के मामले में केन्द्र को फटकार लगाई, कहा छूट सतत विकास के खिलाफ

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एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 20 जुलाई राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सोमवार को केंद्र को उसके इस कथन के लिये फटकार लगाई कि ‘अति दोहन, संकट वाले और कम संकट वाले’ क्षेत्रों में भूजल के दोहन पर पाबंदी से कुछ राज्यों क्र औद्योगिक उत्पादन, रोजगार के अवसरों और जीडीपी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।

हरित अधिकरण ने अपने उस आदेश की समीक्षा करने से इनकार कर दिया जिसमें उसने ओसीएस क्षेत्रों में उद्योगों को 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' प्रदान करने की इजाजत नहीं दी थी और कहा कि पेयजल को छोड़कर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों या अन्य उद्योगों या वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए छूट सतत विकास और ‘लोक विश्वास के सिद्धांत’ के खिलाफ होगी।

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अधिकरण ने जल शक्ति मंत्रालय और केंद्रीय भूजल प्राधिकरण को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन किए बिना भूजल की निकासी के लिए सामान्य अनुमति न दी जाए, विशेष रूप से किसी भी वाणिज्यिक इकाई को।

एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘‘उपलब्ध सीमित संसाधनों और असीमित माँगों तथा ऐसी गतिविधि के प्रभाव आकलन के बीच प्राथमिकताएं सूचीबद्ध होनी चाहिए तथा पानी निकालने के लिए अनुमति की नीति जलस्तर के आधार पर होनी चाहिए।’’

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पीठ ने कहा कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के बिना पानी निकालने के लिए कोई सामान्य अनुमति नहीं होनी चाहिए, विशेष तौर पर किसी वाणिज्यिक इकाई को।

हरित अधिकरण ने कहा कि उद्योगों को ऐसी अनुमति जल प्रबंधन योजना के अनुरूप होनी चाहिए जिसे इस आदेश के तहत तैयार किया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि कोई भी अनुमति निर्दिष्ट समय के लिए और पानी की निर्दिष्ट मात्रा के लिए होनी चाहिए, हमेशा के लिए नहीं।

पीठ ने कहा कि स्वतंत्र और विशेषज्ञ द्वारा वार्षिक मूल्यांकन में भूजल स्तर का आडिट करके उसे रिकार्ड किया जाना चाहिए और यह देखा जाना चाहिए कि अनुमति की शर्तों का पालन किया जा रहा है।

पीठ ने कहा कि ऐसे आडिट को आनलाइन जारी किया जाना चाहिए जिससे पारदर्शिता बनी रहे तथा वर्ष दर वर्ष भूजल के स्तर में आ रहे बदलाव पर नजर रखी जा सके। साथ ही आडिट में असफल रहने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। कार्रवाई के तहत अनमति वापस लेना, काली सूची में डालना, अभियोजन शुरू करना तथा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व्यवस्था के तहत मुआवजा वसूली शामिल है।

अधिकरण ने मंत्रालय को उसकी उस अर्जी को लेकर खिंचाई की जिसमें उसने पुराने दिशानिर्देशों के अनुसार उद्योगों को अनुमति देने का अनुरोध किया था और कहा कि कानून का अधिदेश सतत विकास है और किसी नीति के लिए केवल आर्थिक विचार पर्याप्त नहीं है।

इस बारे में कोई रूपरेखा नहीं दी गई है कि नयी व्यवस्था भूजल के गिरते स्तर को कैसे रोकेगी उसे अप्रभावित करेगी इस बारे में कोई रूपरेखा नहीं है।

पीठ ने कहा, ‘‘इसमे न तो यह दावा किया गया है कि सीजीडब्ल्यूए द्वारा पिछले 24 वर्षों के विनियमन में भूजल स्तर में सुधार हुआ है और न ही इसमें भविष्य में सुधार के लिए कोई प्रक्षेपण है। नीती अयोग द्वारा उसकी 2018 में प्रकाशित रिपोर्ट 'कम्पोजिट वॉटर इंडेक्स' में संकलित डेटा स्पष्ट है कि कई स्थानों पर दोहन हुआ है।’’

पीठ ने जल शक्ति मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह स्थायी भूजल प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए सीजीडब्ल्यूए की अपेक्षित कार्यप्रणाली और प्रभावी कामकाज सुनिश्चित करे।

पीठ ने कहा, ‘‘जल प्रबंधन योजनाएं, पानी की उपलब्धता या कमी पर आंकड़े और सीजीडब्ल्यूए की नीति पारदर्शिता और सार्वजनिक भागीदारी के लिए उसकी वेबसाइट पर अपलोड की जानी चाहिए। इस तरह की कवायद तेजी से की जानी चाहिए, अच्छा हो यदि यह तीन महीने के भीतर हो।’’

पीठ ने इस बारे में कार्रवाई रिपोर्ट अगले साल 31 जनवरी तक तलब की।

पीठ पत्रकार शैलेश सिंह द्वारा दायर एक अर्जी पर सुनवायी कर रही थी जिसमें देश में गिरते भूजल स्तर पर कार्रवाई करने और भूजल को अवैध रूप से निकाले जाने पर रोक का अनुरोध किया गया था।

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